कब करे धूप यज्ञ हवन सामग्री का प्रयोग 

 संधि तथा दिन-रात की संधि धूप यज्ञ :

करने के लिए सवर्पयक्त काल है। संधिकाल, संक्रमणकाल होता है। प्रकाश ऋण, धन भागो  में विभक्त हो  जाता है, यह रोग-कीटाणुअो  की वृद्धि के लिए बड़ा अनुकूल समय होता है और उसकी आक्रमण शक्ति भी इस समय बढ़ जाती है। संख्या और  शक्ति बढ़ जाने से ये निरोग शरीर को  भी रोगी बनाने का साहस करने लगते हैं। यज्ञ में रोग निरोधक शक्ति होती है। उससे प्रभावित शरीरो  पर सहज ही रोगो  के आक्रमण नहीं होते हैं। यज्ञाग्नि में जो  जड़ीबूटी, शकल्य आदि होम किए जाते हैं वे अदृष्य तो  हो  जाते हैं पर नश्ट नहीं होते। सूक्ष्म बनकर वे वायु में मिल जाते हैं और  व्यापक क्षेत्रो  में फैलकर रोगकारक कीटाणुअो  को  खत्म करने लगते हैं। यज्ञ धूम्र की इस शक्ति को  प्राचीन काल में भली प्रकार परखा गया था। इसका उल्लेख  शस्त्रों  में स्थान-स्थान पर उपलब्ध है

प्रकृति में रहने वाले जीवधारियों के स्वास्थ्य, दुर्गन्ध का निवारण,रोगाणुओं का विनाष होकर स्वस्थ वातावरण का निर्माण होता है, जीवोंकी बुद्धि का विकास होता है। मनुश्यों का व्यवहार श्रेश्ठ बनते हैं और परिवारों में सुख व शान्ति का आनन्द व्याप्त होता है। प्रत्येक मनुष्य अपनेदैनिक जीवन में ष्वांस, प्रष्वांस, मल-मूत्र द्वारा वायु मण्डल में जो गन्दगी उत्पन्न करते हैं। यज्ञ करने से अन्तःकरण की पवित्रता, दोशों से विरक्ति, आनन्द की प्राप्ति, मन की स्थिरता स्वास्थ्य तथा मुक्ति प्राप्त होते हैं।