अग्न्याधान से पूर्व, अग्नि प्रज्वलित करने के लिये एक नई दीयासलाई, कपूर, (या सूखे नारियल के पतले लम्बे टुकड़े), एक पंखा और एक चिमटा पास में रखा होना चाहिए| यज्ञ में काम आने वाली सभी वस्तुएँ जैसे यज्ञ-शाला यज्ञ-कुण्ड , यज्ञ-पात्र, सामग्री, समिधाएँ तथा आसनों इत्यादि की स्वच्छता और शुद्धता का ध्यान रखना जरुरी है क्योंकि इन्हीं से याज्ञिक के मन में यज्ञ के प्रति श्रद्धा और प्रेम जागृत होता है जो यज्ञ-कर्म के लिए परमावश्यक है| प्रायः देखा गया है की अधिकतर याज्ञिक तथा अतिथिगण पौराणिकों की देखा-देखी आचमन के पश्चात् आचमन वाले हाथ को अपने सर के ऊपर से ले जाते हैं जो सरासर अवैदिक पद्धति है| आचमन वाले गीले हाथ को स्वच्छ वस्त्र (नैप्किन या रुमाल) से पोंछ देना चाहिए| समिदाधान:-समिदाधान की तीन समिधाएँ यजमान (पति) द्वारा एक-एक करके अर्पित की जाती हैं| यजमान की धर्मपत्नी का कर्तव्य है कि वह भी पति के हाथों को नीचे से स्पर्श करे| अग्नि प्रदीप्त करने के लिये चन्दन या पलाशादि की तीन समिधाएँ (आठ अंगुल लगभग 7” लम्बी और मोटाई अंगूठे के परिमाण से अधिक न हो (ऐसा कात्यायन ऋषि का मत है) पूरी तरह से घी पात्र में डूबी होनी चाहिए| इन समिधाओं पर सामग्री नहीं लगानी चाहिये| एक-एक समिधा को घी पात्र से निकालकर, दोनों हाथों की दसों उंगलीयों से स्पर्श करते हुए मंत्रोच्चारण की समाप्ति पर यज्ञकुंड में प्रज्वलित अग्नि के ऊपर (पहली समिधा उत्तर में, दूसरी दक्षिण में, और तीसरी समिधा मध्य में) श्रद्धापूर्वक चढ़ावें| यहाँ घी या सामग्री की आहुति देने का विधान नहीं है और न ही समिदाधान के बीच में दूसरी समिधा/समिधाएँ चढ़ाने का नियम है| समिदाधान के पश्चात् ही छोटी और मोती समिधाएँ रखी जा सकती हैं| तदन्तर अग्नि प्रज्वलित करने हेतु पाँच घृताहुति-मन्त्रों में केवल घृत की आहुतियाँ एक-एक मन्त्र की समाप्ति पर ‘स्वाहा’ के साथ प्रदान की जाती हैं| जल-प्रसेचन विधि इस प्रक्रिया को समझने के लिये आपको यह जान लेना चाहिये की यज्ञ–प्रक्रियाओं में अथवा पश्चिम दिशा से आरम्भ होकर पूर्व दिशा में समाप्त होता है| इसी प्रकार जहाँ पर जलधारा समाप्त होती है, वहाँ से जल छिड़कने के लिये जल के समाप्त छोर से अन्दर की ओर से आरम्भ होता है| जल छिड़कने का कार्य हवनकुण्ड की निचली मेखला से नौ इंच (9’) भूमि छोड़कर जल छिड़का जाता है| जल छिड़कते समय घृत सामग्री आदि सम्पूर्ण हवि-द्रव्य जलधारा के अन्दर की ओर होने चाहिये| यज्ञ में काम आने वाली लड़कियों को लकड़ी न कहकर ‘समिधा’ कहते हैं| यज्ञकुण्ड के परिणाम के हिसाब से, यज्ञ के लिये उपयोगी छोटी=बड़ी सब समिधाओं को यज्ञकुण्ड में चढ़ाने (डालने) से पहले अच्छी तरह से साफ करके धुप में पूर्णरूप से सुखा लेना चाहिये ताकि उसमें से जीव-जन्तु निकल जाएँ और नहीं होती और धुआँ उत्पन्न होता है जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है| (संस्कारविधि)| कोयला जलाकर यज्ञ नहीं किया जाता| यज्ञाग्नि में पशु-मांस इत्यादि अभक्ष्य पदार्थों की आहुति देना वर्जित है| निरुक्त 2.7 में ‘यज्ञ’ को ‘अध्वर’ की संज्ञा दी गई है अर्थात् यज्ञकर्म में किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होती| अतः अग्नि में डालने से पहले समिधाओं की ध्यानपूर्वक जाँच कर लेनी चाहिये की उसमें कोई जीव-जन्तु तो नहीं हैं| जिस लकड़ी के जलने से कार्बन-डाई-आँक्साइड गैस की मात्रा कम से कम निकलती हो| जिस लकड़ी के जलने से कार्बन-मोनो-आँक्साइड उत्पन्न न होती हो या अन्य कोई विषैली गैस पैदा न होती हो| लकड़ी कठोर नहीं हो| वृक्ष की लकड़ी जिस के पत्ते तोड़ने पर दूध जैसा द्रव्य निकलता हो| ऐसी लकड़ी जो जलने पर रख हो जाती है, कोयला नहीं| चन्दन, आम, पीपल, बड़, गूलर, पलाश, शमी जैसे वृक्षों की लकड़ियाँ समिधा के रूप में प्रयोग करनी उचित होती हैं| ऋग्वेद के मन्त्र (८.१०२.21) में स्पष्ट आज्ञा प्रदान है कि ‘जिस वृक्ष की लकडियों को दीमक या उसकी जाती का कोई कीट (कीड़ा) खाता है, वहसब पीपल, ढाक आम, आदि की कोमल लकड़ियाँ तेरा प्रदीपक हैं| अर्थात् उपर्युक्त वृक्ष की लकड़ी को समिधा के उपयोग में लाना उचित है| अध्वर अर्थात् हिंसा रहित (ऋग्वेद: १.१.८,ऋ. १.२६.१, ऋ. १.४४.१३), (यजुर्वेद: १.१, ३.23, ६.11), (अथर्ववेद: ४.24.३, १.४.२, ५.12.२, 18.२.२) और (मनुस्मृति: ३.१६) इत्यादि, ऐसे अनेक मन्त्र हैं जिनमें कहा गया है कि ‘सब प्रकार के जीवों की रक्षा करो’, ‘उनकी हत्या मत करो’| यज्ञ में किसी भी प्रकार के पशु-मांस का प्रयोग करना वर्जित ही नहीं, घोर अपराध है-महा-पाप है| ‘स्वाहा’ उच्चारण किये बिना आहुति देना व्यर्थ है| ‘स्वाहा’ को यज्ञ का ‘आत्मा’ कहा गया है| ‘स्वाहा’ का अर्थ है त्याग और समर्पण भाव से प्रदान करना| स्वाहा के उच्चारण से अहंकार/अभिमान समाप्त होता है| अतः चहिये| स्वाहा शब्द के अनेक अर्थ हैं| वैदिक विद्वानों के अनुसार सु+आह=स्वाहा=(१) सुमधुर बोलो| (२) सत्य बोलो और अपनाओ| (३) जो मन में है, वही वाणी से बोलो और अपने कहे अनुसार कर्म करो अर्थात् मन-वचन-कर्म में कोई अन्तर न हो| (४) जो कर्म करो समर्पण भावना से करो| (५) त्यागपूर्वक कर्म करो| (६) स्वाहा का अर्थ होता है-काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, राग-द्वेष, मन-अपमान, चुगली, अहंकार, बदले की भावना इत्यादि जैसे अपने अन्दर छुपी हुई बुराइयों को आहुत करना| शुध्द घी तथा सामग्री की आहुतियाँ मन्त्रोच्चारण के अंत में ‘स्वाहा’ उच्चारण के साथ यज्ञ कुण्ड के मध्य में प्रज्वलित अग्नि के ऊपर ही ठीक प्रकार से प्रदान करनी चहिये जिससे घी या सामग्री यज्ञ कुण्ड के बाहर न गिरने पाये| यह यज्ञ की एक विशेष आचार-संहिता है-‘पहले मंत्र पाठ तदनन्तर क्रिय’ और इस अनुशासन का पालन यज्ञ में भाग ले रहे, यज्ञवेदी पर बैठे, सभी सदस्यों को अनिवार्य रूप से करना चाहिये| मंत्रोच्चारण के पश्चात् ‘स्वाहा’ के साथ ही यज्ञकुंड में अग्नि में शुध्द घृत तथा सामग्री की आहुति प्रदान करनी चाहिये| (शतपथब्राह्राण: १.५.३.१३, ३.३.२.7) ‘स्वाहा यज्ञं कृणोत्न’ (ऋग्वेद: १.१३.१२) इस मन्त्रांश में भी वही आदेश है कि ‘मंत्रोच्चारण के पश्चात् ही ‘स्वाहा’ उच्चारण के साथ ही आहुति प्रदान करने की क्रिया करनी चाहिये|’ प्रत्येक मनुष्य को कम से कम सोलह आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिए और अधिक आहुतियाँ देने की इच्छा हो तो ‘ॐ विश्वानि देव सवित्दुर्रितानि परा सुव| यद् भद्रं तन्न आ सुव||’ इस मंत्र और पूर्वोक्त गायत्री मंत्र; (ॐ भूभुर्वः स्वः| तत्सवितुर्व-रेणयं भर्गो देवस्य धीमहि| धियो यो नः प्रचोदयात्||) से आहुति देनी चाहियें| सामग्री को तीन १. अनामिका (हाथ की दूसरी उंगली जिसमें अँगूठी पहनते हैं), २. मध्यमा (बीच की लम्बी उंगली) और ३. (अँगूठे) से पकड़ना चाहिये| ‘स्विष्टकृत आहुति’ का अर्थ है ‘इष्टसुखकारिणी’ अर्थात् अच्छे प्रकार से चाहे हुए सुख को (प्रदान) करने वाली आहुति (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाः राजधर्मविषय) स्विष्टकृत़् अर्थात् अच्छे प्रकार से सुख को करने वाला| प्रधान यज्ञ के पश्चात् ही स्विष्टकृत आहुति देने का विधान है| यह आहुति प्रधान हवन की पुष्कलता के लिये होती है अतः यज्ञ की समाप्ति पर ही दि जाती है, पहले नहीं| किसी भी सुपात्र व्यक्ति या संस्था के कल्याण तथा उत्थान हेतु प्रदान की जाने वाली सहायता राशी तथा वस्तु ‘दान’ कहाती है| ‘दान’ श्रध्दा और प्रेम से भेंट किया जाता है| यज्ञ के सन्दर्भ में ‘दान’ की परिभाषा है-त्याग एवं समर्पण भाव से अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पित करना| स्मरण रहे की दान माँगा नहीं जाता, अपनी इच्छा से भेंट किया जाता है| दान की वस्तुएँ-फल, वस्त्र, बरतन, आभूषण, धनराशी इत्यादि अनेक उपयोगी वस्तुएँ भेंट की जा सकती हैं| विद्या-दान सर्वश्रेष्ट दान कहाता है| (ऋ.१.१२०.६) उत्तम दाता उसको कहते हैं जो देश, काल और पात्र को जानकर सत्य विद्या, धर्म की उन्नति रूप परोपकारार्थ देवे| सत्यपुरुषों की ही सेवा और सुपात्रों को दान किया करो| (यजु. १.१०२.५) यज्ञ के ब्रह्मा का कर्तव्य/काम है यज्ञकर्म की गतिविधियों का बारीकी से निरीक्षण करना, होने वाली त्रुटियों को सुधारना तथा मार्गदर्शन करना| यदि यज्ञ के दौरान त्रुटियाँ राह जाती हैं तो उसका उत्तरदायित्व ब्रह्मा पर होता है| देखा गया है कि ब्रह्मा/पुरोहितगण यज्ञकर्म कराने के बदले में अपने समय का मुआवज़ा ‘धन’ माँगते हैं जो एक अवैदिक परम्परा है| यज्ञकर्म करने से यजमान को सांसारिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है, मोक्ष की नहीं| मोक्ष की प्राप्ति होती है-वेदाध्ययन करके वेदोक्त आचरण से, मन, वचन और कर्म द्वारा सत्याचरण से, पातंजलि अष्टांग योग के अभ्यास से तथा निष्काम कर्मो के करने से और ईश्वर समर्पण से| स्वर्ग कहते हैं-संसार में सब सुख-सुविधओं के साथ जीवन जीने को, अनुकूल परिस्थितियों में जीने को, जिस घर में नित-प्रतिदिन संध्योपासना होती हो, नियमित रूप से यज्ञ होता हो, घर में सुख-सम्पत्ति-समृद्धि हो, शांति हो, सुशिक्षित धर्मपत्नी और चरित्रवान पति हो, उनकी आज्ञाकारी संतानें हो, वैदिक सन्यासियों, विद्वानों, अतिथियों और मित्रो का आवागमन हो, सभी एक-दूसरे की बात मानते हों आदि जहाँ ऐसी परिस्थितियॉ हों, समझो वह घर स्वर्ग है अन्यथा विपरीत परिस्थितियों को ‘नरक’ कहते हैं| सांसारिक सुख का सम्बन्ध भौतिक शरीर से होता है अतः सुख में कहीं न कहीं दुःख मिश्रित होता है और सुख का अंत दुःख ही होता है अतः हमें मोक्ष की तीव्र इच्छा रखनी चाहिये| मोक्ष अर्थात् सब प्रकार के दुःखो से छुट जाना| हवन से वायु शुध्द होकर सुवृष्टि होती है, उससे शरीर निरोग और बुध्दी विशद होती है, विद्या प्राप्त होती है और स्वर्ग अर्थात् सुख की प्राप्ति होती है| (उपदेशमंजरी) |[/vc_column_text][/vc_column][/vc_row]