सभी प्रकार की पूजा, ग्रह नक्षत्रो  एवं सोलह संस्कारो  में धूप,हवन की अनिवार्यता रहती है। इससे शुद्ध सात्विक स्वस्थ वातावरण उत्पन्न होता है। पंचमहाभूतो  की शुद्धि होती है। वास्तु दोष  का शमन होता है। ध्यान में मन लगता है। यह सामग्री उत्तम तकनीक द्वारा शुद्ध साफ असली बिना तेल निकली अोषधिय गुणो से युक्त एवं प्राकृतिक सुगंधयुक्त जड़ू-बूटियो  का मिश्रण है। सुगंध से मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु में एक प्रकार की गति उत्पन्न होती है। इससे मन हृदय पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। परिणामतः रक्त संचार में तेजी आ जाती है, ऑक्सीजन ज्यादा मिलती है, इसका प्रयोग जीव में एक प्रकार का आनंद उल्लास पैदा करता है।

विभिन्न प्रकार की सामग्री का प्रयोग करने का आदेश हमारे शास्त्रों ने दिया है, इस सामग्री में कुछ सुगंध बढाने वाली बूटियाँ डाली जावें। सामग्री का कुछ भाग पोष्टिक पदार्थों से बनाया जावे। इसके अतिरिक्त एक भाग रोग नाशक जड़ी बूटियाँ भी एक निश्चत मात्रा में डालने के लिए कहा गया है। गौरीश धूप, यज्ञ, हवन सामग्री में जब हम यह सब पदार्थ एक निश्चित अनुपात में मिला कर सामग्री तैयार करते हैं। इस सामग्री से हमारा वायु मंडल शुद्ध हो कर सुगंध से परिपूरित हो जाता है । हमारा शरीर इस यज्ञ के वायु से, इस यज्ञ के धुएं को वायुमंडल से प्राप्त कर पुष्टि को प्राप्त होता है । इस सब के साथ ही साथ जब इस प्रकार के यज्ञ के वायु क्षेत्र में हम निवास करते हैं तो हमारे शरीर के अन्दर निवास करने वाले रोग के कीटाणुओं का नाश होने लगता है तथा हम अनेक प्रकार के रोगों से बच जाते हैं।

निवृत्ति करता है। इससे वायु, वृष्टि, जल की शुद्धि होकर, खाद्य सामग्री व वनस्पतियाँ शुद्ध होती हैं। शुद्ध वायु का श्वास स्पर्श, खान-पान से आरोग्य, बुद्धि, बल पराक्रम बढ़ता है। इसे ‘देवयज्ञ’ भी कहते हैं क्योंकि यह वायु आदि पदार्थों को दिव्य कर देता है।’ पर्यावरण को शुद्ध बनाने का एकमात्र उपाय यज्ञ है। यज्ञ प्रकृति के निकट रहने का साधन है। रोग-नाशक औषधियों से किया यज्ञ रोग निवारण वातावरण को प्रदूषण से मुक्त करके स्वस्थ रहने में सहायक होता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी परीक्षण करके यज्ञ द्वारा वायु की शुद्धि होकर रोग निवारण की इस वैदिक मान्यता को स्वीकार किया है।