दीप और धूप यज्ञ दोनों ही भारतीय देव संस्कृति के प्राण हैं। दीपक प्रज्वलन देव पूजा का एक महत्वपूर्ण आधार है। देव पूजन में उसका सुनिश्चीत स्थान होता है। मंदिरों की सुबह-शाम की आरती में उसका अनिवार्य रूप से समावेश रहता है। दीपावली इस विद्या का वार्षिकोत्सव है। प्रत्येक धर्म-कर्म में दीपक जलाया जाता है। किसी खुशी के अवसर पर, समारोह शुभारंभ पर, उद्घाटन के अवसर पर अपने उल्लास-आनन्द को दीपक के द्वारा ही प्रकट किया जाता है।

घर में नित्य घी का दीपक जलाने से ऋणावेशित आयन्स की वृद्धि होती है। दरअसल घी का दीपक जलाने से घृत में उपस्थित विशिष्ट रसायनों का ऑक्सीकरण होता है। यही ऑक्सीकरण ऋणावेशित आयन्स अथवा घर की धनात्मक ऊर्जा में वृद्धि करता है। हमारे शास्त्रों में तो दीपक की लौ की दिशा के सम्बन्ध में भी पर्याप्त निर्देश मिलता है।

पुरातन वैज्ञानिक ऋषि सिद्धान्तों को अपनाएँ, हरियाली संवद्र्धन कर इस भूमि को हरीहर, हरी-भरी, हरीमय बनाएँ।

बचा चरू दिव्य प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। आहुतियों से बचा `इदत्रमम्’ के साथ टपकाया हुआ तथा वसोधरा से बचा घी घृतआवरण के रूप में मुख, सिर तथा हृदय आदि पर लगाया व सूंघा जाता है। होमीकृत औषधियों एवं अन्य हव्य पदार्थों से संस्कारित भस्म को मस्तक तथा हृदय पर धारण किया जाता है।

हवन के अन्त में समीप रखे हुए जल पात्र में कुश, दुर्वा या पुष्प डुबो-डुबोकर गायत्री मंत्र पढ़ते हुए रोगी पर उस जप का मार्जन करें, यज्ञ की भस्म रोगी के मस्तक, हृदय, कण्ठ, पेट, नाभि तथा दोनों भुजाओं से लगाएँ। इन सरल प्रयोगों को अनेक बार प्रयोग करके देखा गया है।

वस्तुत: अग्निहोत्र से धुआँ नहीं, ऊर्जा का प्रसारण होता है। ऊर्जा युक्त वायु हल्की होती है और हल्की वायु ऊपर को उठती है और नासिका द्वारा ग्रहण की जाती है। ऊर्जा में बढ़ा हुआ तापमान होता है वह त्वचा से स्पर्श करके रोम कूप खोलता है। स्वेद निकलता है और उस स्वेद के साथ ही रक्त तथा मांसपेशियों में जमे हुए रोग, वायरस, विजातीय तत्वों का निष्कासन होता है। इससे चर्म रोग मिटते हैं और बालों तथा त्वचा की जड़ों में जो अदृश्य कृमिकीटक होते हैं, वे समाप्त होते हैं, खाज, दाद, छाजन आदि भी ठीक हो जाते हैं। अग्निहोत्र ऊर्जा के साथ जुड़ी हुई उपयोगी शक्ति से रक्त में रोगनाशक शक्ति बढ़ती है। इसे जीवनी शक्ति का अभिवर्धन भी कह सकते हैं। इस आधार पर उस मूल कारण की समाप्ति होती है, जिससे भीतरी-बाहरी अंगों में शिथिलता छाई रहती है। आलस्य, भय, घबराहट, धड़कन, अपच जैसे रोगों में अग्निहोत्र लाभदायक होता है।