हमारे देश में संयुक्त परिवार की प्रथा रही है, जहाँ से हमें खाने-पीने में आयुर्वेद का ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त होता था। छोटीमोटी तकलीफ यू ही ठीक हो जाया करती थी। घर का बुजुर्ग महिलाओं में एक क्लिनिकल सेंस था, हमारे चेहरे हावभाव को देखकर ही वह समझ जाती थी और घरेलू चिकित्सा हमें बिना बोले ही मिल जाती थी। जैसे सर्दी जुकाम है तो हमारी चाय में हमारे बिना बोने ही अदरक लोंग डाल देना। दादी-नानी कहानी-किस्सों के माध्यम से जीवन में आने वाले संकटों-संघर्षों से जूझने के तरीके सिखा देते हैं, इससे बच्चों के मन में चुनौतियों का डटकर सामना करने का भाव और शक्ति स्वाभाविक रूप से आ जाती है। वास्तव में यह भावी जीवन में स्वाभाविक रूप से आने वाली कठिन और विपरीत परिस्थितियों के प्रति कहानियों के माध्यम से किया गया मानसिक टीकाकरण है। आजकल पति पत्नि दोनों ही नोकरी करते हैं जो अपने बच्चों के साथ बड़े शहरों में फ्लेट में रहते हैं। जरा-सी परेशानी होने पर घबरा जाते हैं। आयुर्वेद क्या और वैसा था इस पर ध्यान देना आवश्यक है। घर में खाने के मसाले हो या ज्यूस मौसमी सब्जियाँ, प्रुट्स हो या गर्म हल्दी का दूध हो। सिरदर्द, पेटदर्द, खराब खट्टी डकारें, हिचकी, दात दर्द, मुंह के छाले, कानदर्द, गला बैठा, कांटा निकालना, खुजली, जलने पर, पांव की बिवाई, बच्चों की मालिश हो या साफ सफाई, घर की शाम की धूप (दिया-बत्ती) हो या उपवास रखा जाये यह सब बिना बोले घर में चलता रहता था। पर अब सब बदल रहा है। अपने शरीर में क्या हो रहा है, वह क्या है, किसने बना है, उसने अन्दर की हड्डियाँ, मांस, खून, आदि वैâसे बनते है, उन सबका क्या मतलब है। शरीर में बोलने वाला कौन है, हममें हरकत कहाँ से आती है, हममें कभी अच्छे और कभी खराब विचार कहाँ से आते हैं, हमारी मर्जी के बिना यह मन वैसे करोड़ों मीलों की दोड़ लगाता है, शरीर चींटी की चाल चलता है और मन हवा से भी हजार गुना तेज दौड़ता है, इनके कारणों का हमें कुछ भी पता नहीं। शरीर के बारे में मामूली बातों की जानकारी हरेक आदमी के लिए जरूरी समझी जानी चाहिए। बालकों की पढ़ाई में भी इस ज्ञान को शामिल करना चाहिए। हम लोग को जरा से रोगों में तुरन्त डाक्टर के यहाँ दौड़ने की आदत पड़ गई है और न सही तो वैमिस्ट या पड़ौसी की सलाह से ही दवा ले लेते हैं। हम मान बैठे हैं कि दवा बिना रोग नहीं जाता। घर में एक बार दवा आई कि फिर रह निकलने का नाम ही नहीं लेती। अगर इन सब पर विचार करने बैठें तो शर्म से हमारा सिर नीचा हो जाना चाहिए। हमारे देश में यज्ञ चिकित्सा प्रणाली से ही भस्म एवं क्षार-चिकित्सा, गैस-चिकित्सा, धूम्र-चिकित्सा, रस चिकित्सा, अंजन-चिकित्सा, ताप-चिकित्सा, वात-चिकित्सा, जल-चिकित्सा, रश्मिचिकित्सा, स्वेद-चिकित्सा, ध्वनि-चिकित्सा संगीत-चिकित्सा, मानसिकचिकित्सा, आदि-आदि का उद्गम होता है। रोगों के दूर होने से दीर्घायु प्राप्त होती है। चिकित्सा एवं ओषधियों का प्रयोजन अन्ततः आयु का संरक्षण एवं वृद्धि है अतः इसकी आयुर्वेद संज्ञा हो जाती है। जंगल होने पर ही वायु शुद्ध होगी। तभी हम कह सवेंगे वायु भेषज तत्त्व को – ओषधि तत्त्व को अच्छे प्रकार लावे, ले जावे। वह ओषधि युक्त वायु कल्याणकारक, रोगनाशक एवं सुखकारक हमारे हृदय, शरीर के भीतर के हृदय प्रवेश के भाग के समीपस्थ पुफ्पुसों में अच्छी प्रकार प्रवेश करे, उसमें गति करे। वह भेषजयुक्त वायु जो हमारे हृदय एवं वक्ष स्थल में तथा शरीर के जिस भाग में प्रवेश करे वह रोग को नष्ट कर आयु को देने वाला हो। दुनिया में ऑक्सीजन प्रोड्यूसर केवल वृक्ष हैं। वृक्ष के कम होने से ऑक्सीजन कम हो रही है और कार्बन-डाई-ऑक्साइड अवशोषित नहीं हो पा रही है। जिसके कारण सही ढंग से साँस नहीं ले पा रहे हैं। ऑक्सीजन कम मिलने पर हमारे शरीर की मेटोबोलिज्म एक्टीविटी डिस्टर्ब हो रही है। जिससे मानसिक प्रदूषण घर में और घर के बाहर सभी जगह पैल रहा है जो समाज के लिये अत्यन्त गंभीर खतरा है। एलोपैथी का इतिहास मुश्किल से चार सौ साल पुराना है, जबकि हजारों वर्ष पूर्व ही महर्षि चरक और आचार्य सूश्रूत ने गहन खोजों के बाद आयुर्वेद तथा शल्य चिकित्सा के विस्तृत ग्रंथ लिख डाले थे। आज पूरा विश्व एलोपैथी दवाईयों से घबरा चुका है। वह एक रोग को ठीक करती हैं तो दूसरा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। इन दवाईयों के साइड इपेक्ट हैं। सभी देशों के लोग अल्टरनेटिव मेडिसीन की तरफ देख रहे हैं। इस प्रकार की १४० विधाओं को विश्व में मान्यता प्राप्त है। वेदों ने एवं भारत के ऋषियों ने जिन अलग-अलग विधाओं की खोज की थी आज उन पर अनुसंधान करने, अपनाने, आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। जिसमें प्रथम यज्ञोपैथी हो सकती है। आज वैज्ञानिकों ने रश्मि-चिकित्सा, जल-चिकित्सा, ओषधि-चिकित्सा, प्राकृतिक-चिकित्सा उपवास-चिकित्सा, प्राण-चिकित्सा, ताप-चिकित्सा, विद्युत – चिकित्सा आदि अनेक-अनेक प्रकार निकाले हैं उनमें अभी बहुत उन्नति की आवश्यकता है। जीवन एवं धन के मध्य धन का महत्व मानव ने अधिक मानकर मानव को रोग ग्रस्त कर दिया। परन्तु जीवन देने वाली ओषधियों की उत्पत्ति एवं उनके गुण वृद्धि के विज्ञान पर ध्यान नहीं दिया। वेद ने ओषधियों को परिपूर्ण रस एवं गुणों से युक्त करने की विधि का प्रतिपादन किया है वह प्रचलित होना चाहिए। ओषधियों के रस से परिपूर्ण होने से ही उनका उपयोग लेने से उनके गुणों का प्रभाव हमारे शरीर पर एवं विश्व पर पड़ सकता है।

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आत्मविस्मृत भारतीय समाज अपने गौरवशाली स्वर्णिम अतीत से कटकर जिस प्रकार पश्चिम का अनुगामी हो रहा है, वह आँखें खोलने वाला है। आम भारतीय पश्चिम के रंग में आकण्ठ डूबता जा रहा है। अपने आयुर्वेद का महत्व उसे पाश्चात्य देशों के सर्टिफिकेट के बाद समझ में आ रहा है। आयुर्वेद समग्र जीवन का विज्ञान है। अतः यह केवल शरीर पर ही ध्यान नहीं देता अपितु मन और आत्मा के स्तर पर भी विचार करता है। इसी कारण शरीर, मन और आत्मा-ये तीन आयुर्वेद के पदार्थ है जिनके आधार पर क्रमशः त्रिविध चिकित्सा-युक्तिव्यपाश्रय, सत्त्वावजय तथा दैवव्यपाश्रय की स्थापना हुई है। यह त्रिपक्षीय दृष्टिकोण आयुर्वेद की अवधारणा को समग्रता प्रदान करता है। पुरुष को वास्तविक स्वास्थ्य की उपलब्धि शरीर, मन और आत्मा के प्रसन्न रहने पर ही हो सकती है। इसी कारण आयुर्वेद को ऐहिक सुख का साधन मानने के अतिरिक्त मोक्ष के भी साधन माना गया है। त्रिदोष-सिद्धान्त आयुर्वेद के समग्र दृष्टिकोण को परिपुष्ट करता है। सभी अंग-प्रत्यंगों में ये ही दोष व्याप्त होकर उनकी प्राकृत क्रियाओं का संचालन करते हैं और विकृत होने पर अधिमान भेद से विविध लक्षण उत्पन्न करते हैं। अतः आयुर्वेद की चिकित्सा समस्त शरीर-मन को ध्यान में रखकर की जाती है, पृथक् – पृथक् अंगों के विभाग से नहीं। आत्मशक्ति का तो रोग-निवारण तथा अवरोध के लिए बहुत ही महत्व है। आत्मा ही शरीर के अंग-अंग में शक्ति का संचार करती है। आत्मा ही जीवन का कारण है। इसकी शक्ति सत्त्व भाव द्वारा पाई जाती है। काम, क्रोध, मोह, लोभ कलियुग में बहुत बढ़ गये हैं। आयुर्वेद के अनुसार ऐसे दुर्विचार मन की अशान्ति द्वारा अनेक रोगों का कारण बनते हैं। सत्यनिष्ठा, एकाग्रता इत्यादि सद्विचार मन को शान्ति देते हैं तथा आत्मा की शक्ति का संचार करते हैं। आत्मशक्ति से रोग-निवारण की विधियाँ मैंने अथर्ववेद से ली हैं तथा उनका साधारण मन्त्रों द्वारा आधुनिक जीवन में सदुपयोग बताया है।

अथर्ववेद में औषधियों को देवता का स्वरूप माना गया है। यह ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन भारत में ‘देवता’ शब्द प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। कोई भी वस्तु जो शक्तिशाली, प्रभावशाली, मित्रवत् और सहयोगी होती थी, उसे देवता कहा जाता था।