किसी भी सर्वहितकारी और कल्याणकारी शुभ कार्य को ‘यज्ञ’ की उपाधि से सम्बोधित कर सकते हैं| ‘यज्ञ’ के मुख्य तीन अर्थ होते हैं-देव-पूजा, संगतिकरण और दान|इन तीनों शुभ-कर्मों को सिद्ध करना हो तो वह ‘अग्निहोत्र’ अर्थात् हवन करने से पूरा होता है| प्रज्वलित समिधाओं पर (अग्नि के ऊपर) वैदिक विधि-विधान से, मंत्रोच्चारण करते हुए, गाय के ‘शुद्ध घी’ तथा ऋतुओं के अनुसार बनाई गई ‘हवन सामग्री’ की (कम से कम १६) आहुतियाँ अर्पित करने को ‘अग्निहोत्र’ या हवन कहते हैं| मीमांसादर्शन के अनुसार, यज्ञ-कर्मकाण्ड में जो विशेष अलग-अलग नामों से आहुतियाँ प्रदान की जाती हैं, उन आहुतियों को ‘याग’ कहते हैं| शब्दकोष में भी ‘याग’ का यही अर्थ मिलता है| अग्निहोत्र, हवन या होम करना एक प्रकार की वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसका मुख्य उद्देश्य या प्रयोजन है-वायुमंडल की शुद्धि करना और रोगमुक्त वातावरण बनाना है, जिससे संसार के सब जीवधारी स्वस्थ और सुखी रह सकें| स्वस्तिवाचन-यज्ञ करते हैं घर, परिवार, आस-पास में सुख, समृद्धि एवं शान्ति के लिए| इसलिए सबसे पहले हम इन मन्त्रों से ईश्वर से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं| ये मन्त्र चारों वेदों में से चुने गये हैं| यह ३१ मन्त्रों का समूह है| इससे सब शुभ होता है| शान्तिकरण-इन मन्त्रों द्वारा परमात्मा की प्रार्थना करने से हमारे विचार सकारात्मक होते हैं| इसमें २८ मन्त्र होते हैं| संकल्प का अर्थ होता है-दृढ़ निश्चय करना, व्रत लेना, पूर्ण निश्चय करना, प्रतिज्ञा करना| अग्निहोत्र प्रारम्भ से करने से पूर्व हम सर्वव्यापक ईश्वर के समक्ष हाथ में जल लेकर जीवन के शुभ कार्यो के करने की प्रतिज्ञा करते हैं तथा आज की इस पवित्र वेला का भी स्मरण करके संकल्प लेते हैं| विश्व में जब से अग्निहोत्र की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई तब से ही हमारे आदि प्राचीन ऋषियों ने समय की गणना आरम्भ की ओर आज तक वही गणना चली आ रही है| संकल्प मन्त्र में ईश्वर के समक्ष अग्निहोत्र करने वाले महानुभाव को वर्तमान समय की तिथि, स्थान आदि हर चीज का ज्ञान होना चाहिये| यह अच्छी बात है| कालान्तर में इस समय की गिनती बिना भूल-चूक बनी रहती है| १. शुध्दता(पवित्रता) २. सत्यता ओर ३. शीतलता| इन्हीं तीन बातों का ध्यान रखते हुए हम तीन मंत्रोच्चारण के साथ तीन बार आचमन करते हैं और ईश्वर से विनम्र प्रार्थना करते है कि वह हमारे भीतर, बाहर और सब ओर शुध्दता, सत्यता और शीतलता बनाये रखे| जल शुध्दता, निर्मलता और शीतलता का प्रतीक होता है इसलिए प्रथम आचमन से से शारीरिक पवित्रता, द्वितीय आचमन से मानसिक पवित्रता और तृतीय आचमन से आत्मिक पवित्रता बनी रहे| ऐसी पवित्र भावना से तीन बार आचमन करना वैदिक विधि-विधान के अनुरूप है| यज्ञ की प्रत्येक क्रिया ‘प्रतीक मात्र’ होती है और बार-बार वही क्रिया करने से कालान्तर में उसका प्रभाव हमारे भौतिक और अभौतिक शरीर पर पड़ता है जिसके फलस्वरूप हमारे संस्कार भी शुध्द-पवित्र होते हैं| आचमन से एक और विशेष लाभ होता है कि (थोड़ी मात्र में जल पीने) हमारा गला भी गीला (तरल) रहता है जिससे आगे के मंत्रोच्चारण करने में आसानी होती है| स्वच्छ जल को पवित्र माना गया है| शरीर के जिस अङ्ग का जल से स्पर्श किया जाता है उस समय वैसी भावना की जाती है कि प्रभु हमारी उस इन्द्रिय को शुध्द-पवित्र और निर्मल कर रहा है| इस प्रकार हम मन्त्र बोलते हुए प्रत्येक अङ्ग को स्पर्श करते हैं और अपने में स्फूर्ति का अनुभव करते हैं| तीन समिधाएँ अर्पित करने के पीछे का भाव यह है कि हम तीनों लोकों अर्थात् द्यौ-लोक (चमकते सूर्य-तारे आदि), अंतरिक्ष-लोक (विद्युत् बिजली) और पृथ्वी-लोक (भौतिक अग्नि-प्रकाश) की अग्नियों को समर्पित करते हैं| चन्दन की समिधाएँ अर्पित करने से अधिक खुशबू का वातावरण उत्पन्न होता है| वास्तव में दिशाएँ दस होती हैं| ‘उत्तर’ (उत्तरायण) अर्थात् प्रकाश की दिशा ओर ‘दक्षिण’(दक्षिणायन) अर्थात् दिशा अंधकार की दिशा मनी जाती है, इसलिए पहली समिधा हवनकुण्ड के उत्तरी भाग में और दूसरी समिधा दक्षिण भाग में प्रदान की जाती है और तीसरी समिधा हवनकुण्ड के मध्य में अर्पित की जाती है| इस भावना से सब दिशाओं का समावेश हो जाता है| मौन आहुति अर्थात् उस मन्त्र का मन में उच्चारण करके समिधा अर्पित करना-उसका कारण यह बताया जाता है कि ‘मन हमारी सब इन्द्रियों का राजा होता है (सब इन्द्रियाँ मन के अधीन होती हैं) अर्थात् बिना मन की आज्ञा के कोई भी इन्द्रिय काम नहीं करती, इसलिए मन का विशेष स्थान होता है उसी को ध्यान में रखकर एक मौन आहुति अर्पित करने का विधान है| मौन रहने से ‘अहंकार से मुक्ति’ भी मिलती है| सब प्रकार के दुःखों के मुख्य तीन ही कारण होते हैं, जिनको दार्शनिक भाषा में-१. आध्यात्मिक दुःख, २. आधिभौतिक दुःख और ३. आधिदैविक दुःख कहते हैं| इन तीन प्रकार के दुःखों से बचने के लिए हमिश्वर से तीन बार ‘शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ बोलकर अपने जीवन में शान्ति बनाये रखने की प्रार्थना करते हैं| १. आध्यात्मिक दुःख वे होते हैं जिन्हें मनुष्य अपनी ही मूर्खता, नादानी और अज्ञानता के कारण भोगते हैं-जैसे आवश्यकता से अधिक खाना-पीना, नशे की हालत में चलना, बेपरवाही से गाड़ी चलाना, गलत दवाई खा लेना एवं ठोकर खाना आदि| २. आधिभौतिक दुःख उनको कहते हैं जो दूसरों की नादानी या अज्ञानता के कारण आपको सहने पड़ते हैं, जैसे गाड़ी ने आपको ठोकर मार दी, किसी जानवर ने काट लिया, दुर्घटना में कोई हानि हो गई आदि आदि| और ३. आधिदैविक वे होते हैं जो अनेक प्राकृतिक विपदाओं के कारण मनुष्य को लाचारी में भुगतने पड़ते हैं जैसे दुर्घटना,जरुरत से अधिक गरमी या सर्दी का होना, तेज़ बारिश का कहर, बाढ़ से सामना, अचानक तूफान, वातचक्र, धुन्ध या समुद्री तूफान (सूनामी) इत्यादि से भी अनेक प्रकार की बाधाओं दुःखों का सामना करना पड़ता है| ईश्वर सबको सदबुध्दी प्रदान करे इसलिए तीनों प्रकार के दुःखों से बचने तथा अपनी रक्षा करने के लिए हम संसार में ‘शान्ति’ बनाये रखने की तीन बार प्रार्थना करते हैं| घरों के यज्ञकुण्डों में यज्ञाग्नि सदा जलती रहती है ऐसी यज्ञाग्नि को ‘आहिताग्नि’ कहते हैं| यज्ञ मात्र एक क्रिया नहीं अपितु सृष्टि विज्ञान का एक नक्शा भी है जिसमे हमें सृष्टि-विज्ञान को समझाया जाता है| समिदाधान में मन्त्र चार होते है और समिधाएँ तीन हैं| ब्रह्माण्ड में तीन लोक होते हैं| पहला लोक है-द्यो लोक जिसमे सूर्य की अग्नि विद्यमान है. दूसरा लोक है-अंतरिक्ष लोक जिसमे विद्युत् (बिजली) होती है और तीसरा लोक है-हमारा पृथिवी लोक जिसमें भौतिक अग्नि (यज्ञाग्नि) होती है और जिसके साथ एक दूसरा पदार्थ भी विद्यमान होता है-वायु| तीनों लोकों में तीन अग्नियाँ विद्यमान होती हैं जिनको समर्पित करने के लिए वैदिक विधान में इन तीन समिधाओं को ही अर्पित करने का विधान है| पहले मन्त्र की समाप्ति पर एक समिधा दोनों हाथों के मध्य में (नमस्ते की मुद्रा में) पकड़कर अर्पित करें| उसी तरह आगे के दो मन्त्र बोलकर दूसरी समिधा और वैसे ही तीसरी समिधा चौथे अंतिम मंत्रोच्चारण के बाद श्रध्दापूर्वक अर्पित करें| यज्ञकुंड के चारों ओर जल छिड़कने का विधान है| यहाँ भी सृष्टि विज्ञान ही समझाया गया है कि पृथ्वी के चारों ओर जल ही जल है| वेद में यज्ञ को ‘अध्वर’ कहा है अर्थात् यज्ञ (अग्निहोत्र) की किसी भी क्रिया भूल-चूक से भी कोई हिंसा नहीं होनी चाहिये| स्विष्टकृत आहुति की विधि बड़े-बड़े यज्ञों-यागों के लिए होती है, जिसमें अनेक क्रियाएँ सम्पन्न करनी होती हैं| वहाँ त्रुटियाँ रह जाने का भ्रम, शंका या संशय बना रहता है अतः स्विष्टकृत या प्रायश्चित्त आहुति देने का विधान है| मनुष्य अपने लिए तो सब कुछ करता ही है| परंतु परोपकार की भावना से वह अन्य छोटे-छोटे पशु-पक्षियों को भी ध्यान में उनका हिस्सा अलग से रखता है| एक आहुति उनके लिये भी दी जाती है और उनका हिस्सा अलग रखा जाता है| प्रकाश की दो दिशाएँ होती हैं| पूर्व दिशा में सूर्य प्रकाश देता है और उत्तर में ध्रुव तारा| याज्ञिक लोग दोनों पूर्व और उत्तर दिशाओं का प्रतिनिधि या प्रतीक मानकर प्रज्वलित दीपक को उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान) में रखते हैं| अग्निहोत्र का अर्थ है जल, पृथ्वी, वायु आदि की शुध्दी के लिए डाली गई आहुतियां| यज्ञ केवल कर्मकांड ही नहीं बल्कि चिकित्सा पध्दति भी है| यज्ञ को हवि भी कहते हैं जिसका अर्थ है विष को हरने वाला|