दीप और धूप यज्ञ दोनों ही भारतीय देव संस्कृति के प्राण हैं। अग्नि की विशेषता होती है कि वह किसी वस्तु के मूल गुण को कई गुना विस्तारित करके वायुमंडल में प्रसारित कर देती है। इस तथ्य को जानने वाले ऋषि-मुनियों ने यज्ञ और हवन की अनोखी विधि का आविष्कार किया। इस विधि से मानव ही नहीं अपितु प्राणियों और वनस्पतियों समेत सम्पूर्ण पर्यावरण का कल्याण निहित है। आयुर्वेद की विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों में से धूम्र चिकित्सा भी एक है। यज्ञ ज्वाला में जो सामग्री अर्पित की जाती है, वस्तुत: वे विभिन्न प्रकार की औषधियाँ होती हैं। वर्तमान में हुए प्रयोगों से यज्ञ द्वारा अनेक रोगों के उपचार को चिकित्सकीय वैज्ञानिक मान्यता भी मिली है। वस्तुत: यज्ञ, धूप अनेक उद्देश्यों को अपने में समेटे हुए एक वैज्ञानिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक आयोजन होता है। जो समाज में उदात्त भावनाओं का संचार भी करता है। धूम्रपान द्वारा निम्नलिखित रोग शान्त हो जाते हैं तथा बल में वृद्धि हो जाती है- सिर का भारीपन, सिर शूल, पीनस, आधासीसी, कान और नेत्र का शूल, कास, हिचकी, दमा, गलग्रह, दाँतों की दुर्बलता, कान, नाक, नेत्रों से दोषजन्य दाााव का होना, नाक से दुर्गन्ध आना, आस्यगन्ध, दाँत का शूल, अरोचक, अनुग्रह, मन्याग्रह, कण्डु, कृमिरोग, मुख का पीला होना, कफ निकलना, स्वरभेद, गलभुंडी उपजिह्विका, स्वालित्य (अन्धापन), केशों का पीला होना व गिरना, छींक आना, अधिक तन्द्रा आना, बुद्धि का व्यामोह होना, निद्रा आना आदि।

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धूम्रपान के निम्नलिखित आठ समय होते हैं क्योंकि इन्हीं समयों में वात और कफ का प्रकोप हुआ करता है- (१) `स्नान के बाद’, (२) भोजन के बाद, (३) वमन के बाद, (४) छींक आने के बाद, (५) दातौन के बाद, (६) नस्य लेने के बाद, (७) अंजन लगाने के बाद और (८) निद्रा से उठने के बाद। इस प्रकार धूम्र सेवन करने से गले की हड्डी के ऊपरी भाग में वात-कफ के रोग नहीं होते। इस प्रायोगिक धूम्र को एक बार में तीन घूँट पीना चाहिए तथा तीन बार अर्थात् कुल नौ घूँट पीना चाहिए।

मदनरत्न के अनुसार- छ: भाग कुष्ठ, दो भाग गुड़, तीन भाग लाक्षा, पाँचवां भाग नखला, हरीतकी, राल समान अंश में, तज एक भाग, शिलाजय तीन लव जितना, नागरमोथा चार भाग, गुग्गल एक भाग लेने से अति उत्तम दशाङ्ग धूप तैयार हो जाता है। अन्य मत के अनुसार चंदन, कुष्ठ, नखला, राल तथा गुड़ शर्वरा, नखगंध, जटामांसी, लघु, क्षौद्र सबको समभाग में मिश्रित कर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसको दशाङ्ग धूप कहते हैं।

षोडशाङ्ग धूप– अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्वरा, नागरमोथा, चन्दन, इलायची, तज, नखनखी, मुशीरं, जटामांसी, कर्पूर, तालीसदल, कर्पूर, गुग्गल ये सोलह प्रकार के धूप माने गए हैं जो कि देवता एवं पितृ-कार्यों में प्रशस्त है इसे षोडशाङ्ग धूप कहते हैं।