धूप यज्ञ का वैज्ञानिक पक्ष

“पहले आर्य लोगों का ऐसा सामाजिक नियम था कि प्रत्येक पुरुष प्रातः काल स्नानकर सोलह आहुति देता था, क्योंकि प्रातः काल में मल्मुत्रादिकों की दुर्गन्ध उत्पन्न होती थी वह इस प्रातःकाल के हवन से दूर होती थी| इसी तरह सांयकाल में हवन करने से दिनभर के जमा हुई जो दुर्गन्ध थी, उसका नाश होकर रात भर वायु निर्मल और शुद्ध चलती थी|” “सुवृष्टि और वायु शुद्धि होम हवानादि से होती है, इसीलिए होम करना चाहिए|” मनु के वचन आधुनिक समय में विदेशी विद्वानों की दृष्टि में भी प्रयोगों द्वारा सिद्ध होने पर उन्होंने महर्षि मनु को विश्व में पप्रसिद्धतम एवं महानतम् स्वास्थ्य-सम्बन्धी सुधारकों में मन है| आज से सौ वर्ष पूर्व ही आधुनिक ऋषि स्वामी दयानन्द औद्योगिक युग के क्रियाकलापों से उत्त्पन्न विषमावस्था का कारण एवं निवारण अग्निहोत्र आदि यज्ञों का त्याग एवं ग्रहण बताते हैं-“इन दिनों होम के न्यून होने से बार-बार वायु बिगड़ रही है, सदा विलक्षण रोग उत्पन्न होते जाते हैं|”

अमेरिका के विद्वान एंड्रो जैक्सन डेविस ने “मेघ बरसाने का विज्ञान” शीर्षक लेख में वर्षा क लिए जो सिद्धान्त दिया है वह यज्ञ के वर्षा-सिद्दांत से मिलता जुलता है|

आज जब औद्योगिक प्रक्रमों के माध्यम से वायु, जल, पृथ्वी तीनों प्रदूषित किये जा रहे हैं ऐसे समय यज्ञ से सर्वतः शुद्ध वर्षा परम उपयोगी हो सकती है| यज्ञ से वर्षा केवल कराई ही नहीं जाती अपितु अतिवृष्टि रोकी भी जा सकती है| अतिवृष्टि से नदियों से बाढ़ आ जाने से अकल्पनीय हानि होती है| वैदिक मनीषियों की सुस्पष्ट मान्यता है कि विधिवत् यज्ञ करके अतिवृष्टि रोकी जा सकती है| ऋग्वेद की निम्न ऋचा जिसे चतुर्वेद भाष्यकार आचार्य सायण ने “इयमतिवृष्टिविमोचनी” अर्थात् अतिवर्षा को रोकनेवाली कहा है| कृषि प्रयोगों क साथ ही अग्निहोत्र से वायुशुद्धि, वर्षाशुद्धि, मृतिकाशुद्धि, भी होती रहती है, जिससे समस्त प्राणी जगत् को अल्प परिश्रम साध्य महान् लाभ प्राप्त होता है| अध्यात्मिक प्रदूषण में मानसिक स्तर का प्रदूषण ग्रहण किया जाता है| अग्निहोत्र से मन पर सकारात्मक प्रभाव होने से प्रदूषण से होनेवाली हानियाँ समाप्त हो जाती हैं| प्रदूषण से हुई हानियों से प्रकट हुए रोग भी अग्निहोत्र के विधिपूर्वक प्रयोग से सही होते देखे गये हैं| अमेरिका के एक मनोवैज्ञानिक श्री वैरी रैथनर ने पूना विश्वविद्यालय में ‘अग्निहोत्र का मानसिक तनाव पर प्रभाव’ नामक विषय पर शोध किया है| उन्होंने शोध निष्कर्ष प्राप्त किया कि अग्निहोत्र चिकित्सा से बच्चों का मृगी रोग जाता रहता है और मानसिक रूप से अविकसित बच्चों की बुद्धि विकसित हो जाती है| श्री राघनेर का कथन है की वैदिक यज्ञ से पृथ्वी और अन्य ग्रहों की गति द्वारा उठनेवाली प्राकृतिक तरंगों का वातावरण पर विशेष प्रभाव पड़ता है, ये तरंगे मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क पर विशेष प्रभाव डालती हैं| सभी भारतीयों का अनुभव है कि अग्निहोत्र का वायुमंडल ध्यान लगाते समय मन को एकाग्र कर्मे में सहायक होता है| स्पष्ट है कि अग्निहोत्र मन तथा सूक्ष्म शरीर के तनावों को दूर करता है, जिसके कारण अनेक रोग दूर होते हैं| भौतिकता प्रधान आधुनिक जीवन ने मानव मस्तिष्क में अनेक प्रकार के तनावों को जन्म दिया है, जिससे जीने का आनन्द ही समाप्त हो गया है | सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय विद्यमान अन्तरिक्ष किरणों तथा अग्निहोत्र से उत्पन्न विद्युत् चुम्बकीय तरंगों के तुल्यकालन (संक्रोंनाईज़ेशन) के कारण मन को शक्ति की रहस्यपूर्ण घटना सुसंपन्न होती है| केवल अग्निहोत्र यज्ञ के प्रभाव से मन को शक्ति मिलती है एवं मस्तिष्क के तनाव समाप्त होते हैं| यदि शास्त्रीय विधि के अन्य यज्ञों का आयोजन किया जाए तो अध्यात्मिक प्रदूषण के निवारण में पुर्णतः सफल हो सकते हैं| अध्यात्मिक प्रदूषण सन्दर्भ में यह तथ्य उल्लेखनीय है “कि केवल भारतीय पद्धति=यज्ञ एवं ध्यान, पूजा, संकीर्तन इत्यादि से ही अध्यात्मिक प्रदूषण को दूर किया जा सकता है|” इस प्रकार पर्यावरण प्रदूषण सम्बन्धी समस्त समस्याओं से केवल यज्ञ के विधिवत् अनुष्ठान के द्वारा छुटकारा पा सकते हैं| प्राकृतिक संरचनाओं के कारण उसमें प्रकृति के ही एक तत्व बुद्धि का अधिक विकास पाया जाता है| जो अन्य जीवों में विद्यमान विशिष्टताओं के समान ही इसकी एक विशेषता है, अनुपमता नहीं| प्रकृति के अन्य जीवों में भी ऐसी विशेषताएं प्राप्त होती हैं, जो हमें अनुपम सी प्रतीत होती है, किन्तु यह विशेषता उसके जीवन रक्षणोपाय के रूप में होती है| इस प्रकार यह समस्त चक्र परस्पर अनुपूरक है| प्रमुखतया इसे हम पंचभौतिक चक्रों के रूप में परिभाषित कर सकते हैं| इन पाँच चक्रों में (पार्थिव चक्र, जलीय चक्र, आग्नेय चक्र, व्याव्य चक्र, आकाशीय चक्र) अनेक छोटे-छोटे चक्र अन्तर्निहित रहते हैं| जैसे वायु में-आक्सीजन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, कार्बन चक्र आदि| इन प्रमुख पाँच भौतिक चक्रों में सृष्टि में एक चेतना चक्र भी विद्यमान रहता है जो समस्त चेतनावान् संवेदनशील प्राणियों से सम्बंधित है|इस चक्र में भी अनेक छोट-छोटे चक्रों का समावेश पाते हैं-यथा परिवार चक्र, समाज चक्र, कृषि चक्र, प्राकृतिक-वनस्पति चक्र एवं जीव-जंतु (अरण्य) चक्र आदि| यहाँ चक्र उस सतत गतिमान् प्रक्रम से है जो अपने आप में विकास एवं संतुलन को समेटे हुए है| जो सोच विचार कर कार्य करे, इस लक्षण से युक्त प्राणी को मनुष्य मननशील प्राणी है| प्राणी है| प्रस्तुत शोध-प्रबंध इसी प्रवृत्ति से उद्भूत हुआ है| अब इस औद्योगिक युग में प्रदूषण की समस्या से व्याकुलित होकर मनुष्य इससे रक्षण पाने के लिए इधर-उधर हाथ पाँव मार रहा है| “प्रदूषण का सहन सीमा के अंतर्गत होना ही स्वस्थ पर्यावरण है|” मनुष्य ने अपने मानसिक विनोद और परस्पर प्रतिद्वन्द्विता के द्वन्द्व में दंभ की संतुष्टि के लिए वैज्ञानिक प्रक्रिया को जारी रखते हुए चाहे-अनचाहे अनन्त प्रकृति को चुनौती दे दी| विकास की यह यात्रा यहीं से पथभ्रष्ट हो गई| सुविधाएँ जुटाना एवं प्रकृति के रहस्य जानने के उद्देश्य से प्रकृति का शोषण मनुष्य समाज के लिए श्रेयस्कर सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि मनुष्य प्रकृति का एक अंश है और कोई भी अंश अपने अंशी को क्षतिग्रस्त, आहत करके सुरक्षित सुखी नहीं हो सकता है| वर्तमान में पर्यावरण प्रदूषण की भयावहता इसी प्रकृति चक्र में हस्तक्षेप का दुष्परिणाम है| ये अभी तक हमारे सामने जितने आ चुके हैं अभी हम उतनों को ही नहीं झेल पा रहे हैंऔर नये-नये प्रत्यक्ष होते जा रहे हैं| भूमंडलीय ताप औद्योगिक प्रगति का अभिशाप है यह सम्पूर्ण ऋतुचक्र को अव्यवस्थित कर समग्र संतुलन को नष्ट कर रहा है| वायु-प्रदूषण का प्रभाव संपूर्ण प्राणी जगत पर वनस्पति जगत् पर साथ-साथ ही स्थापत्य धरोहर पर भी पड़ रहा है| वायु के वास्तविक महत्त्व को जनसामान्य में बताया जाए, क्योंकि सामान्य मनुष्य वायु के महत्त्व को जानकर उसे प्रदूषित न करने का निश्चय धारण कर सकेंगे| अनिवार्य रूप से होने वाले प्रदूषण के लिए वृक्षारोपण सामान्यतः प्रदूषणरुपी विष का स्वयं पान करने के कारण शिवरूप माने गये| कुछ वृक्षों में विशेषतः प्रदूषण को नष्ट करने के लिए विशेष क्षमता होती हैं, ऐसे वृक्षों को आधुनिक अनुसन्धान के द्वारा चिन्हित करके उनसे विशेष लाभ लेना चाहिए| अवश्यम्भावी प्रदूषण को नष्ट कर सृष्टि में सात्विक विशुद्ध पर्यावरण निर्माण करने के लिए अमोघ अस्त्र यज्ञ है| जो वायु-प्रदूषण को प्रत्येक स्तर पर नष्ट करने में सक्षम है| ‘जल जीवन के लिए अनिवार्य तत्व है’ का बोध प्रत्येक मनुष्य में हो सके यह आवश्यक है| जल के केन्द्रों को दूषित करना जघन्य पापकर्म अर्थात् निंदनीय कर्म था वर्षा से जल में गति आ जाती है और गति जलशुद्धि में| यज्ञ एकमात्र ऐसा साधन है जो मूल केन्द्र वर्षा को शुद्ध करके सभी जल केन्द्रों का शुद्धि करक सिद्ध होता है| जलशुद्धि की रासायनिक विधियाँ हानिकारक सिद्ध हो चुकी हैं, क्योंकि क्लोरीन का सतत प्रयोग पाचन तंत्र एवं संवेदनशील अंगों पर दुष्प्रभाव देता हुआ यमदूतरूपी कैंसर को निमंत्रण देता है| परम्परागत विधियों के साथ-साथ ताम्बे एवं चाँदी तथा सोना धातु का प्रयोग भी जल के जीवाणुमुक्तता में उपयोगी पाया गया है| भूगर्भ जलस्त्रोतों के लिए पारम्परिक छोटे-छोटे तालाब वे दीर्घजीवी गहरी जड़वाले वृक्षों का प्रयोग लाभदायक होता है| आदिसृष्टि के तत्व के रूप में गंध लक्षणवाली पृथिवी है| उसमें गुरुत्व के कारण आकर्षण है, जिससे सम्पूर्ण सृष्टि व्यवस्थित है| आधुनिक विचारधारा में कृषि आदि का हेतु अपने गर्भ में अमूल्य खनिज को धारण करने वाली पृथ्वी है| इन दोनों से ही मृदा हानिकारक रसायनों का शिकार हो रही है| अन्य कई प्रकार के मानवीय हस्तक्षेपों से पृथ्वी के सारभूत सूक्ष्म रूप से भूस्खलन, भूकम्प आदि असामान्य रूप से होने लगते हैं| पृथ्वी के महत्त्व को सार्वजानिक रूप से स्वीकार कराना और जनसामान्य को मानसिक रूप से सज्जित करना की पृथिवी की सुरक्षा में ही अपनी अर्थात् सम्पूर्ण प्राणी-जगत् की सुरक्षा है| पृथ्वी की रक्षा करने के लिए वनों का असंतुलित कटान एवं खदानों की अव्यवस्थित खुदाई नहीं करनी चाहिए| केवल इतने वृक्ष कांटे और इतनी ही खुदाई करें की पृथ्वी के घाव अधिक गहरे न हों और शीघ्र ही भर जाएँ अर्थात् सन्तुलित एवं व्यवस्थित कार्य-प्रणाली अपनानी चाहिए| जब हम पृथ्वी को माता और स्वयं को उसका पुत्र मानेंगे तो उससे उतना ही लेंगे, जिससे उसमें हमेशा देते रहने की सामर्थ्य बनी रहे| यज्ञ एकमात्र ऐसी क्रिया है जो आधिदैविक, आधिभौतिक, और अध्यात्मिक त्रिविध दुःखों को दूर करने में समर्थ है| कोई ऐसा जीवन का क्षेत्र नहीं है जहाँ यज्ञ हमारा सहारा नहीं हो सकता है|