आज प्रदूषण के बारे में बात कहाँ से शुरू की जाए और कहाँ समाप्त, इस प्रदूषण की कथा अनंत है। रसायन बनाने से लेकर उपयोग होने बाद तक खतरनाक होते हैं। रसायन उद्योग में लगने वाला कच्चा माल हो या तैयार माल सभी में खतरा रहता है। गैसों का प्रभाव किन्हीं परिस्थितियों में प्राणी पर उदासीन अथवा अनुवूल हो, किन्तु इनका प्रभाव प्रतिवूल अधिक होता है। गैसों का प्रतिवूल प्रभाव केवल मनुष्यों, पालतू और जंगली जानवरों, पौधों आदि पर ही नहीं पड़ता, बल्कि संपूर्ण परिस्थिति विज्ञान पर पड़ता है।

पश्चिम जर्मनी में १९४८ में जंगल सूखकर नष्ट होने लगे थे तब वहाँ तीन महीने तक लगातार यज्ञ कराने का यह चमत्कारिक प्रभाव हुआ कि उसी वर्ष में ही पतझड़ के मौसम के बाद हरियाली आनी प्रारम्भ हो गयी और कुछ ही वर्षों में जंगलों के सभी पेड़ पुनः हरे-भरे हो गये। यह सब नियमित हवन किए जाने का प्रभाव था। इस प्रयोग से वहाँ के वैज्ञानिक भी बहुत प्रभावित हुए। प्रदूषण को दूर करने वाला तो लगभग सम्पूर्ण वनस्पति जगत है, क्योंकि वनस्पतियाँ अपने अंत:–श्वसन में कार्बनडाइआक्साइड ग्रहण कर नि:श्वसन में ऑक्सीजन छोड़ती हैं। आजकल विश्व के समक्ष एक नयी समस्य उत्पन्न हो गयी है वह है ग्लोबल वार्मिंग जिससे समस्त विश्व आतंकित है। आज प्रदूषित वातावरण के कारण विश्व के १३० देशों के २५०० वैज्ञानिकों को चेतावनी देनी पड़ी की यदि पर्यावरण – शुद्धि पर अब भी तुरन्त पर्याप्त ध्यान न दिया गया, यदि पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान को रोकने के प्रभावी कदम न उठाए गये तो ग्लेशियर पिघल जाएंगे, गरम लहरें, अति वर्षा आदि से संसार के कई नगर समुद्र में डूब जाएँगे और धरती विनाश के कगार पर पहुँच जाएगी।

गाय के गोबर से लिपा हुआ स्थान आण्विक विकिरण के प्रभाव से पूर्ण सुरक्षित रहता है, गाय के घी को अग्नि में डालने पर उससे उत्सर्जित धुआँ आण्विक विकिरण के प्रभाव को काफी हद तक कम कर देता है। भारतीय भाषा में इस प्रक्रिया को “यज्ञ” कहा जाता है। चिली देश के एण्डीज पर्वत पर एक विशिष्ट यज्ञ शाला का निर्माण किया गया है जहाँ वैज्ञानिक विधि से यज्ञ करके अनेक लोगों ने अनेकों रोगों से मुक्ति पाई है। खेतों में नियमित रूप से हवन करने से वातावरण शुद्ध होता है तथा पौधे तेजी से बढ़ते हैं। पौधों के कीटाणुओं के नाश के लिए यज्ञ की राख बड़ी कारगर सिद्ध हुई। नेशनल बोटेनिकल रिसर्च इन्सिटट्यूट, लखनऊ ने भी काफी परीक्षण एवं अनुसन्धान के बाद यह सिद्ध कर दिया कि हवन के प्रयोग से वायु का प्रदूषण बहुत अधिक मात्रा में खत्म हो जाता है। एक सामान्य व्यक्ति एक दिन में जितनी वायु ग्रहण करता है, यह मात्रा सारे दिन में ग्रहण किए गए अन्न और जल की मात्रा से ६ गुनी अधिक होती है। इससे स्पष्ट है कि मनुष्य के जीवन में खाद्य से भी अधिक महत्व वायु का है। वायु न मिले तो मनुष्य कुछ क्षण भी जीवित नहीं रह सकता, अन्न के अभाव में तो वह महीनों तक जीवित रह सकता है। यज्ञ का वैज्ञानिक आधार ही यह है कि अग्नि से अर्पित की गई वस्तुओं को कई गुना अधिक सूक्ष्म बनाकर वायु में पैला देती है। वायु का शोधन करने वाला यज्ञ मनुष्य का प्राणदाता है।

(१) शारीरिक थकान निवारण एवं सामथ्र्य बढ़ाने के लिए, (२) मानसिक बुद्धिबल बढ़ाने तथा भावनाओं में उत्कृष्टता लाने के लिए एवं (३) अदृश्य वातावरण एवं वायुमंडल का संशोधन करने के लिए। भारतीय संस्कृति में यज्ञ परम्परा के पीछे समग्र वैज्ञानिक आधार है।

आग जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है और वह पेफड़ों को हानि पहुँचाती है, इस बात को हमारे ऋषि-मुनि भी जानते थे। वे इस तथ्य से अनजान नहीं थे, लेकिन उन्होंने प्रत्येक विज्ञान के साथ वायु विज्ञान का भी अनुसंधान किया था। उन्होंने यह पता कर लिया था कि यज्ञ द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड कम और लाभदायक तत्व प्रचुरता के साथ उत्पन्न होते हैं, इसलिए उन्होंने यज्ञ को श्रेष्ठ कर्म बताया। भारतीय आयुर्वेदाचार्यों, जैसे धन्वन्तरि, चरक, सुश्रुत, बाणभट्ट आदि सभी ने यज्ञ-चिकित्सा को उच्च कोटि का माना है। ऋषियों ने उसे आत्मोत्कर्ष का साधन ही माना है। मनोविकारों से ग्रसित लोग अपने लिए तथा दूसरों के लिए अनेक समस्याएँ पैदा करते हैं। शारीरिक रोगों का तो इलाज है, पर मनोविकारों की कोई चिकित्सा अभी तक नहीं मिल सकी है।

अनेक प्रदूषणों के कारण इन दिनों शारीरिक रोगों से अधिक मानसिक रोग की समस्या है। व्यक्तित्व को विकृत बनाने वाली सनक तथा आदतें मानसिक बीमारियाँ हैं, ये मनुष्य को अर्धविक्षिप्त बनाए रखती हैं। यदि किसी प्रदूषण के कारण शरीर को ऑक्सीजन कम मिले, अशुद्ध वायुमंडल में उसका अंश कम हो तो शारीरिक बीमारियों के अतिरिक्त मानसिक विकृतियाँ भी हो जाती हैं। लड़खड़ाकर बोलना, आंत्रशोथ, चिड़चिड़ापन, थकावट, भय और आशंका जैसे मनोविकार इसी स्थिति के परिणाम हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं दुःख भोगता और दूसरों को भी दुःख देता है। यज्ञोपचार द्वारा मानसिक रोगों का इलाज संभव है। मानसिक रोगों में यज्ञ चिकित्सा द्वारा सफल इलाज होता है। बस वायु मिश्रित औषधियों का धुआँ शरीर में नासिका मार्ग द्वारा ही प्रवेश करना चाहिए। मस्तिष्कीय रोगों की चिकित्सा अभी प्रारंभिक अवस्था में चल रही है। सनकी, शंकालु, भयभीत, उत्तेजित, अधीर, दुराग्रही, क्रोधी, दिग्भ्रांत, चिन्तित, लोभी, अहंकारी स्तर के लोग शारीरिक रोगियों से भी अधिक कष्ट सहते और कष्ट देते हैं। इनका इलाज कहीं किसी चिकित्सा पद्धति में नहीं है,

ऑक्सीजन की समुचित मात्रा कोशिकाओं को किसी वजह से न मिले तो मस्तिष्कीय विकृतियाँ उत्पन्न होंगी। यज्ञ द्वारा उत्पन्न हुई गैसें उपचार प्रस्तुत करती हैं, जो अनेक मानसिक व्याधियों के इलाज में सहायक होती हैं। यज्ञ द्वारा उन्माद, अपस्मार, सिरदर्द जैसे प्रत्यक्ष रोगों का उपचार हो सकता है। वायु के प्रभाव से होने वाले रोगों में मानसिक रोगों के अतिरिक्त श्वास नली के रोग आते हैं। यज्ञ चिकित्सा इन सभी तंत्रों को सीधे प्रभावित करने के कारण अपना लाभ अधिक मात्रा में और कम समय में प्रस्तुत कर सकती है। औषधि विज्ञान की मान्यता है कि रोग विषाणुओं से उत्पन्न होते हैं, इसलिए उन्हें मारने वाली प्रक्रिया अपनानी चाहिए। एलोपैथी में अधिकतर दवाइयों के साइड इपेâक्ट होते हैं। देखा जाता है कि एलोपैथी उपचार से स्वस्थ होने के उपरांत भी कई दिनों तक व्यक्ति बीमार दिखता है। यह कठिनाई यज्ञ चिकित्सा में नहीं है, क्योंकि हवन में जो हवष्यि होम किए जाते हैं, वे सभी परिशोधन एवं परिपोषण प्रकृति के होते हैं। इसलिए उपचार ऐसा होना चाहिए, जिससे हर स्तर की दुर्बलता घटती और शक्ति बढ़ती हो।