भारत में लोक परम्परा से संबंधित यह ज्ञान वैदिक समय (१०००-५००० बी.सी.) से देखा जा सकता है। हमारे वैदिक ग्रंथ, ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ऐसे कई उदाहरण सामने आते हैं जिससे स्पष्ट होता है कि वैदिक समय में लोगों द्वारा वनस्पतियों का उपयोग चिकित्सा के रूप में हुआ करता था। ऋग्वेद में ६७, यजुर्वेद में ८१, आयुर्वेद में ७००, अथर्ववेद में २९०, सिद्ध पद्धति में ६०० तथा यूनानी पद्धति में ७०० औषधीय प्रजातियों का वर्णन मिलता है। चरक द्वारा ४३१ प्रजातियों का वर्णन तथा सुश्रुत द्वारा ३९५ प्रजातियों का वर्णन किया गया है।

अनादि काल से ही प्राणीजगत और वानस्पतिक जगत में अटूट संबंध रहा है। इनका अटूट एवं स्वस्थ संबंध ही स्वच्छ पर्यावरण की स्थापना करता है। वनस्पति जीवनीय वस्तु प्रोटीन, वसा एवं शर्करा जैसी प्रधान वस्तुओं तथा लवण एवं जल का संगठित स्वरूप है, जिनके ऊपर संपूर्ण प्राणी-जगत अपना भरण-पोषण करता है। वैज्ञानिक विश्लेषण से यह ज्ञात भी हो चुका है कि वृक्षों से भिन्न-भिन्न रसों की प्राप्ति होती है और अपने इन गुणों के कारण ही ये वानस्पतिक रस रोगों को शांत करने वाले हैं। कुछ वृक्ष ऐसे भी हैं जिनसे मिश्रित रसों के स्वाद का आभास होता है। इस प्रकार मीठे, अम्ल और नमकीन रसों के मिश्रण में वातशामक, चरपरे, मीठे, एवं कषाय रसों के मिश्रण में पित्तशामक तथा चरपरे, कड़वे और कषैले रसों के मिश्रण में कफनाशक गुण पाए जाते हैं। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि उपर्युक्त सभी छ: रसों में त्रिदोषनाशक गुण विद्यमान हैं। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि पृथ्वी से जल एवं लवण, सूर्य से प्रकाश तथा वायु से कार्बन की प्राप्ति वनस्पति शरीर में भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्ति प्रदान कर वनस्पति जीवन का संधारण करती है। इन वनस्पतियों की यही शक्तियाँ प्रदूषणजन्य रोगों में औषधि का कार्य करती है। वृक्ष न केवल भू-क्षरण को रोकने, छाया प्रदान करने, मरुस्थल को उर्वरा भूमि में बदलने, इमारती सामान, र्इंधन, अधिक वर्षा होने तथा औषधि रूप में उपयोगी हैं बल्कि पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने और कम करने में भी लाभदायक सिद्ध हुए हैं। वायु, जल, स्थल, रासायनिक प्रदूषण आदि के कारण उत्पन्न अनेक रोग जैसे वात-पित्त-कफ, ज्वर, शोध (dropsy), विषूचिका (cholera), पाण्डुता (pallor), सिरदर्द, श्वास (asthma), कुष्ठ (leprosy), खुजली, राज्यक्षमा (T.B.), क्षय, अतिसार (diarrhea), उाल्टयाँ (vomiting) आदि इन वृक्षों के फल, पूल, छाल, पत्तियों इत्यादि के विविध उपयोगों से समूल नष्ट हो जाते हैं। वनस्पति जीवनीय वस्तु प्रोटीन, वसा एवं शर्करा जैसी वस्तुओं तथा लवण एवं जल का संगठित स्वरूप है, जिनसे संपूर्ण प्राणी-जगत अपना भरण-पोषण करता है। इन तत्वों के भिन्न-भिन्न मात्रा में संगठित होने से वृक्षों में छ: प्रकार के रस निर्मित होते हैं जो इस प्रकार हैं- १. मधुर (dulacious), २. अम्ल (acid), ३. लवण (salt), ४. कटु (bitter), ५.तिक्त (acrid)तथा ६. कषाय (astringent) आदि।