ऋतु-सन्धि तथा दिन-रात की सन्धि यज्ञ करने के लिए सर्वोपयुक्त काल है। सन्धिकाल, संक्रमणकाल होता है। प्रकाश ऋण, धन भागों में विभक्त हो जाता है, यह रोग-कीटाणुओं की वृद्धि के लिए बड़ा ही अनुकूल समय होता है और उसकी आक्रमण शक्ति भी इस समय बढ़ जाती है। संख्या और शक्ति बढ़ जाने से ये निरोग शरीर को भी रोगी बनाने का साहस करने लगते हैं।

यज्ञ में रोग निरोधक शक्ति है। उससे प्रभावित शरीरों पर सहज ही में रोगों के आक्रमण नहीं होते हैं। यज्ञाग्नि में जो जड़ी-बूटी, शाकल्य आदि होम किए जाते हैं वे अदृश्य तो हो जाते हैं पर नष्ट नहीं होते। सूक्ष्म बनकर वे वायु में मिल जाते हैं और व्यापक क्षेत्र में पैलकर रोगकारक कीटाणुओं को खत्म करने लगते हैं। यज्ञ धूम्र की इस शक्ति को प्राचीन काल में भली प्रकार परखा गया था। इसका उल्लेख शास्त्रों में स्थान-स्थान पर उपलब्ध है। जैसे- यजुर्वेद में कहा गया है अग्नि में प्रक्षिप्त जो रोगनाशक, पुष्टि प्रदायक और जलादि संशोधक हवन सामग्री है, वह भस्म होकर वायु द्वारा बहुत दूर तक पहुँचती है और वहाँ पहुँचकर रोगादिजनक घटकों को नष्ट कर देती है। इसी तरह अथर्ववेद में कहा गया है- “अग्नि में डाली हुई हवि रोग कृमियों को उसी प्रकार दूर बहा ले जाती है, जिस प्रकार नदी पानी के झागों को बहा ले जाती है। यह गुप्त से गुप्त स्थानों में छिपे हुए घातक रोगकारक जीवाणुओं को नष्ट कर देती है।

यज्ञाग्नि से बची हुई भस्म का भी औषधियों की तरह प्रयोग किया जाता है। इसी तरह के प्रयोग-परीक्षण चिली, पोलैण्ड तथा पश्चिम जर्मनी में भी चल रहे हैं। इन प्रयोगों में न केवल अनेक वनौषधियाँ प्रयुक्त होती हैं, वरन् अनेक स्तर की समिधाओं का भी एक दूसरे से भिन्न प्रकार का प्रतिफल पाया गया है। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि जिन क्षेत्रों में इस प्रकार के यज्ञ आयोजन हुए हैं, वहाँ अपराधों की संख्या कम हुई है। मानसिक तनाव एवं पारस्परिक द्वेष कम हुए हैं, यज्ञ वातावरण की प्रत्यक्ष उप्लाव्धिया देखी गई हैं। जिन परिवारों में अग्निहोत्र का प्रचलन हुआ है, उनमें बीमारी के प्रकोप में कमी हुई है।