‘आयुर्दा असि आयुर्मे देहि|’ अर्थात् यज्ञ आयु प्रदान करता है| यज्ञ का मुख्य लाभ है-आसपास के वायुमंडल को कुछ हद तक शुद्ध करना| अन्य लाभ हैं: (१) यज्ञाग्नि में गोघृत तथा सामग्री (विभिन्न प्रकार के सुगन्धित पदार्थ तथा औषधि गुणों से भरपूर जड़ी-बूटियों का मिश्रण) की आहुतियों से निकलने वाली सूक्ष्म गन्ध वायु को शुद्ध करती है और यह वायु देश-विदेश में जाकर सब pranpranप्राणधारी (जीवों) को स्वास्थ्य लाभ पहुँचाती है| यह सर्वश्रेष्ठ परोपकारी कार्य है क्योंकि इससे अपने हों या पराये, मित्र हों या शत्रु सबको लाभ पहुँचाता है| (२) सब प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते हैं तथा अध्यात्मिक उन्नति होती है| (३) यज्ञाग्नि से उठने वाले धुएँ से पेड़-पौधों तथा वृक्षों को लाभ होता है जिसके फलस्वरूप वे हमें ऑक्सिजन प्रदान करते हैं| (४) यज्ञाग्नि में आहूत पदार्थ (घृत और सामग्री) सूक्ष्म होकर वायु द्वारा आकाश में बादलों में भेदन शक्ति उत्पन्न करके वर्षा करते हैं, जिससे फसल (उपज) अधिक और पौष्टिक होती है| (५) यज्ञ से यजमान तथा यज्ञ में भाग लेने वाले अतिथियों के मन में नकारात्मक विचार समाप्त होते है तथा उनमें सकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगते हैं| (६) दैनिक यज्ञ करने वालों के ह्रदय से भय का नाश होता है| (७) मन में सच्ची भावना रखकर यज्ञ करने तथा यज्ञ-मन्त्रों के अर्थ को समझकर वैसा ही अपने जीवन में आचरण करने से यजमान के सब कार्य पूर्ण होते हैं| स्वभाव से मनुष्य दो प्रकार के होते हैं-एक आन्तरिक वृति के लोग जो बहुत कम बोलते हैं अर्थात् अपने अन्दर ही डूबे रहते हैं, ऐसे लोग दूसरों से अधिक ज्ञानवान होते हैं और दूसरे प्रकार के लोग बहिर्मुखी वृति के होते हैं, ऐसे कर्मशील होते हैं और बाहरी दुनियाँ में ही प्रसन्न रहते हैं| जीवन में सफलता की दृष्टि से दोनों प्रकार की प्रवृत्ति के लोग अधूरे होते हैं क्योंकि मनुष्य के लिये मात्र ज्ञानवान होना पर्याप्त नहीं होता और केवल कर्मशील होने से भी किसी के सब कार्य सिद्ध नहीं होते| अतः दोनों के मध्य का मार्ग अपनाना उचित होता है और उसी में ही समझदारी है| अतः सबको योग्य है कि जिस ज्ञान को प्राप्त करें उसे क्रियात्मक रूप प्रदान करें अर्थात् प्राप्त किये गये ज्ञान को हम अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें| जब हम ज्ञान के साथ कर्म को जोड़ेंगे तो ही हमें कर्म करने का भरपूर फल प्राप्त होता है जिससे हमारी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं| परम पिता परमात्मा हमारी पवित्र भावनाओं के साथ-साथ हमारे कर्म को भी देखता है और ज्ञानपूर्वक किया हुआ कर्म हमेशा रंग लता है| वैसे तो हम एक साथ में सभी देवताओं को प्रसन्न नहीं क्र सकते परन्तु ‘यज्ञ’ ही एकमात्र ऐसा श्रेष्ठतम साधन है जिसके द्वारा सभी देवताओं को प्रसन्न कर सकते है तथा यज्ञाग्नि में हम जो-जो प्राकृतिक वस्तुएँ आहूत करते हैं, यज्ञाग्नि उसे लाखों-करोड़ों गुणा बढ़कर वापस करती है| इसके अतिरिक्त दुर्गन्ध और अनेक प्रकार के रोगों का नाश होता है-यह ‘अग्नि’ की भेदन-शक्ति के गुण के ही फल, परिणाम एवं प्रभाव हैं जो अन्य किसी वस्तु में नहीं होते| संक्षिप्त में यज्ञ करने से स्वस्थ तन, शान्त मन और सुखी जीवन प्राप्त होता है| मुख्य यजमान दम्पत्ति (पति-पत्नी) को चाहिये कि वह यज्ञ के निर्धारित समय से पूर्व ही यज्ञ मण्डप में उपस्थित हो| यज्ञकर्म प्रारम्भ करते समय यजमान विनम्रता से हाथ जोड़कर आमन्त्रित पुरोहित/ऋत्विज् का स्वागत करे तथा उससे योग्य आसन पर विराजमान होने के लिये प्रार्थना करे कि, ओ३म् आवसोः सदने सीद| वह पुरोहित/ऋत्विज् आसन ग्रहण करते समय कहेगा ओं सीदामि| पुरोहित/ऋत्विज् के बैठने के पश्चात् यजमान स्वयं भी अपने आसन पर सुखावस्था में सीधे होकर बैठे| इस के पश्चात् पुरोहित के आदेशानुसार यज्ञकर्म की प्रक्रियाओं को श्रद्धा और प्रेम से करे| जैसे-जैसे पुरोहित निर्देशन करे वह वैसे-वैसे करने का प्रयास करे| निम्नलिखित मात्रा दस क्रमों को ध्यान में रखे और शुद्ध मंत्रों से प्रेमपूर्वक यज्ञ कर्मकाण्ड को 15-20 मिनिटों में सम्पन्न कर सकते हैं- १. संकल्प मन्त्र, २. आचमन मन्त्र, ३. अंगस्पर्श मन्त्र ४. ईश्वर-स्तुतिप्रर्थानोपासना मन्त्र ५. अग्न्याधान मन्त्र, ६. अग्निप्रदीप्तकरणमन्त्र, ७. जल-प्रसेचन मन्त्र, ८. आघारावाज्याहुति मन्त्र, ९. प्रातः कालीन/सांयकालीन मन्त्र और १०. पूर्णाहुति मन्त्र|