यज्ञ में यदि कार्बन डाई ऑक्साइड असीमित गति से निकलती होती तो वहाँ पर भला किसी का बैठा रहना क्या सरल होता? किसी थोड़े स्थान पर अधिक संख्या में जनता के एकत्र होने पर दम घुटने लगता है, लोग तुरन्त वहाँ से भागने लगते हैं, किन्तु यज्ञ में ऐसा नहीं होता, प्रत्युत यज्ञ की सुरभि से जन-जन का मनमयूर प्रफुल्लित होकर नाच उठता है। यह सम्भव होता है, उस अनुपम उत्तम हवन सामग्री से, जिसको आहुतियों के रूप में अर्पित किया जाता है। यह हवन सामग्री पुष्टिकारक, सुगन्धित, मिष्ट एवं रोगनाशक वनस्पतिक पदार्थों के रेशेदार मोटे मिश्रण से बनायी जाती है, जिससे न तो सामग्री उड़कर इधर-उधर गिरती है और न श्वास के माध्यम से कोई अवरोध उत्पन्न करती है और उसका गैसीय गुण कई गुना बढ़कर वातावरण को पुष्ट, सुरभित, मधुर व आरोग्य गुणों से परिपूर्ण कर देता है। सामग्री के मोटा कूटे जाने का लाभ यह होता है कि उसमें वायु संचार होने से कृमि शीघ्र नहीं पड़ते हैं और यज्ञकुण्ड में सामग्री ठोस न होकर बिखरी रहकर अच्छी जलती है।

केसर में एक रंगद्रव्य, तेल, कोसीन नामक ग्लूकोसाइड तथा शर्करा होती है। हवन में इसका प्रयोग मस्तिष्क को बल देता है। चंदन की समिधाओं से हवन करने से वायुमण्डल शुद्ध एवं सुगंधित होता है। यह शामक, दुर्गन्धहर, दाहप्रशमन तथा रक्तशोधक होता है। हवन में इसका प्रयोग मानसिक व्यग्रता तथा दुर्बलता को दूर करने के लिए किया जाता है। ब्राह्मी का यज्ञ में प्रयोग मेधावर्धक होता है साथ ही मानसिक विकार, रक्त, श्वास, त्वचा संबंधी रोगों का निवारक होता है। इसमें मस्तिष्कीय संरचनाओं के लिए उपयोगी आजोब्रालिक एसिड होता है। सतावरी का हवन वात, पित्त विकारों को दूर करने के लिए किया जाता है। अश्वगंधा में ग्लाइकोसाइड, स्टार्च, शर्करा पायी जाती है यह बलदायक होता है। वट वृक्ष की समिधाओं का प्रयोग रक्त विकारों को मुक्त करने के लिए होता है। कपूर के धुएँ में नजलानाशक गुण होता है शक्कर का हवन हैजा, टी.बी. चेचक आदि बीमारियों को शीघ्र नष्ट करता है। गुग्गल शरीर के अन्दर के कृमियों को मारता है। इस प्रकार यज्ञ में अनेक वनोषधियों का प्रयोग अनेक बीमारियों से हमें बचाता है साथ ही वातावरण को शुद्ध एवं सुगन्धमय बनाता है।

देवीय हवन सामग्री निम्नानुसार हैं- काले तिल, चावल, जौ, शकर, कमलगट्टे, मखाने, कपूर काचरी, जावित्री, अगर-तगर, जायफल, नागर-मोथा, भोजपत्र, जटा माँसी, सूखी-बीला, छाल-छवीला, रक्त चंदन, चन्दन बूरा, गुगल, पीली सरसों, काली मिर्च, गन्ने, पालक, अनार, बिजोरा नींबू मुरा, जटामांसी, वच, कुष्ठ, शिलाजीत, दारु, हल्दी, सठी, चम्पक, मुरता, सर्वोमधी। अर्क, उपमार्ग, शमी, कुशा, खैर, दूर्वा, इलायची, शकर, मिश्री, पीपल का पत्ता, उड़द दाल, समुद्र का झाग, राई, लाजा, सहदेवी पुष्प, भांग, बरक गुंजा, कपूर, शंखपुष्पी, पान, मधु, केला, भैंसा गुगल, नीम गिलोय, जायफल, आंवला, विष्णुकांता, आम्रफल, लोंग, हरताल, कटहल, कागजी निंबू, मेनसिल, शिलाजीत, खिरणी, सिंघाड़ा, वच सुगंधित द्रव्य, अष्टांग धूप, पायस, गुलकंद शतावरी, सौंठ, अबीर, केशर, दालचीनी, काली हल्दी, कस्तूरी, वङ्कादन्ती, मोर पंखी, शिव लिंगी, आमी हल्दी, कपीठ (चूक) पटपत्र, मालकांगणी, मक्खन, अनार के फूल, फल नारंगी, नागकेशर, फूलप्रयंगु, अशोक के पुष्प या पत्र, बिल्वपत्र।