जर्मनी में वैज्ञानिकों द्वारा किए प्रयोगों से भी अब यह सिद्ध होगया है कि रोग कीटाणुओं को मारने की जितनी शक्ति इस ऊर्जा में है उतनी सरल, व्यापक और सस्ती पद्धति अभी तक नहीं खोजी जा सकी है। यज्ञ को प्राचीन काल में शारीरिक व्याधियों और मानसिक व्याधियों के शमन में सफलतापूर्वक प्रयुक्त किया जाता रहा है। आज अर्ध विक्षिप्तता-सनक, बुरी आदतें, अपराधी प्रवृत्तियाँ, उच्छृंखलता, आवेशग्रस्तता, अचिन्त्य चिन्तन, दुर्भावना जैसी मानसिक व्याधियाँ मनुष्य को कहीं अधिक दु:ख दे रही हैं और विपत्ति का कारण बन रही हैं। इसका निवारण यज्ञोपचार का सुव्यवस्थित रूप बन जाने पर भली प्रकार हो सकता है। वर्तमान यज्ञ प्रक्रिया जिस रूप में चल रही है वह भी किसी न किसी रूप में शारीरिक और मानसिक व्याधियों के समाधान में बहुत सहायक है। शारीरिक द्रष्टि से स्वस्थ तो कई व्यक्ति मिल सकते हैं परन्तु मानसिक द्रष्टि से जिन्हें संतुलित, विचारशील, सज्जन, शालीन कहा जा सके, कम ही मिलेंगे।

अन्तरिक्ष में जलीय गर्भ को धारण पोषण पुष्ट और प्रसव कराने में घृत सर्वाधिक समर्थ है। घृत के अतिरिक्त दूध, दही, आदि द्रव पदार्थ आद्र्र द्रव्य, स्नेहयुक्त हविद्रव्य, अन्नादि, वनस्पति इनका धूम मेघ निर्माण में तथा वर्षा कराने में परम सहायक हैं, यदि घृत के साथ इनका प्रयोग हो। घृत गौ का ही सर्वाधिक उपयोगी है। यदि एक सहस्र नारियल के गोलों में घृत, शक्कर, शहद, मेवा, खीर, मोहनभोग (हलुआ), मावा, तिल, जौ आदि पदार्थों को भरकर उनको यज्ञवेदी में अग्नि को अपनी वृष्टि की कामना के साथ समर्पित किया जावे और उच्च स्वर से ऊँ, स्वाहा-की सम्मिलित रूप से बार-बार ध्वनि की जावे तो वर्षा ऋतु में मेघों के होने पर उसी दिन शीघ्र ही वर्षा होगी। मेघ नहीं होंगे तो शीघ्र उत्पन्न होंगे और वर्षा भी उसी दिन १-२ दिन में होगी।