भारतीय संस्कृति यज्ञ-प्रधान है। वेद, रामायण, महाभारत आदि धार्मिक तथा ऐतिहासिक ग्रन्थों में यज्ञ को ही सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यज्ञ करने से पृथ्वी, जल, वायु, तेज, आकाश इन पंचभूतों की शुद्धि होती है। पंचभूतों के सामंजस्य से मानव-शरीर बना है। अत: शरीर को सुरक्षित रखने के लिये पंचभूतों का शुद्ध रूपों में उपयोग आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। सृष्टि निर्माण के चिंतन में भारत के ऋषिरूप वैज्ञानिकों ने पदार्थ की अवस्थाओं तथा पंचमहाभूतों का जो भौतिक, अधिभौतिक एवं आध्यात्मिक विवेचन किया है, नवीन विज्ञान के लिए आश्चर्य का विषय है। वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश आदि देवताओं का सत्कार करना, पूर्ण सदुपयोग करना, संवर्धन करना देव पूजा है, जो यज्ञ द्वारा सम्पन्न होती है।

यज्ञ वैदिक धर्म और संस्कृति के अपरिहार्य अंग रहे हैं। वैदिक युग में धर्म की सबसे प्रमुख अभिव्यक्ति यज्ञ ही थे। उस युग में देवताओं की मूर्तियाँ नहीं थी न ही उनके मंदिर थे। मनुष्य बिना किसी माध्यम के देवताओं से सीधे सम्पर्क रखते थे। ऐसी उपस्थित में उन्होंने ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए, उसके प्रति अपने हृदय के प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए प्रार्थना और समर्पण करना सीखा। प्रार्थना उद्गारों के माध्यम से व्यक्त हुई,जिसमें वेदों की ऋचाएँ हैं, समर्पण के लिए उन्होंने यज्ञ की विधि की खोज की। इसमें वेदी बनाकर अग्नि प्रज्वलित कर भोज्य सामग्री अर्पित की, इस भावना के साथ कि अग्नि देवताओं का मुख है अत: इसके द्वारा उनकी समर्पित सामग्री देवताओं तक पहुँचेगी।

यज्ञ द्वारा वायु और इन्द्र से प्रार्थना की गई है कि वे जल और वायु को दूषित होने से बचाएँ, क्योंकि जल और वायु के दूषित होने से संक्रामक रोगों के होने की संभावना रहती है, जिससे मनुष्यों में बीमारी होने का विशेष भय रहता है- (यजुर्वेद)।

व्यष्टि-समष्टि सम्बन्ध से यज्ञ-महायज्ञ कहे जाते हैं। यज्ञ का फल आत्मोन्नति तथा आत्मकल्याण है, उसका व्यष्टि से सम्बन्ध होने के कारण उसमें स्वार्थ की प्रधानता आ जाती है। (यही इसकी न्यूनता है)। महायज्ञ का फल जगत का कल्याण है, उसका समष्टि से सम्बन्ध होने के कारण उसमें नि:स्वार्थ की प्रधानता आ जाती है। (यही इसकी विशेषता है)।

शोध-कार्यों से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वायुमंडल में आयनों की संख्या मनुष्य के व्यवहार व उसके स्वास्थ्य को बहुत हद तक प्रभावित करती है। यदि आयनों की संख्या घट जाए तो अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं जैसे सिरदर्द, बेहोशी और काम में अरु‘चि। सर्रे विश्वविद्यालय के डॉ. हॉकिंस के शोध से यह पता चलता है कि ब्रिटेन में अच्छे सुहावने मौसम के दिनों में आयनों की संख्या प्रति घन सेंटीमीटर में १००० के लगभग होती है। शहरों में यह लगभग ५०० हो जाती है। कुछ दफ्तरों में आयनों की संख्या शून्य भी हो सकती है। प्रयोग के दौरान डॉ.हॉकिंस ने इन दफ्तरों में आयनाइजरों का प्रयोग किया जो लगभग ३००० से ४००० आयन प्रति घन सेंटीमीटर का उत्पादन करते थे। इस प्रयोग के परिणाम अत्यंत चकित कर देने वाले थे। सिरदर्द अनुभव करने वाले १५ से २५ प्रतिशत कर्मचारियों की संख्या घटकर ६ प्रतिशत रह गई, साथ ही साथ काम करने में उनका मन भी लगने लगा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि दफ्तरों में आयनों की कम संख्या का कारण वातानुकूलन यंत्र थे। वातानुकूलन यंत्रों में वायु पतली नलिकाओं में से खींची जाती है जिससे ऋणायन इन धातु की नलिकाओं से चिपक जाते हैं और वायु में आयनों की संख्या बहुत कम हो जाती है। आयनाइजरों का प्रयोग करने से अनेक परिस्थितियाँ जैसे ज्वर, दमा, माइग्रेन रोकी जा सकती है। यज्ञ इसी प्रकार की शक्ति है। विज्ञान में वह वातावरण ही आयनों की संख्या बढ़ाता है।