संन्यासाश्रम में प्रवेश करने से पूर्व उसका यज्ञोपवीत उतार लिया जाता है जो यह दर्शाता है कि भविष्य में वह संन्यासी सब प्रकार के कर्मकाण्डों से मुक्त है| संन्यासी का मुख्य कर्तव्य है कि वह समाज के सभी वर्गों में नियमितरुप से वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करता रहे तथा किसी भी प्रकार की राजनीति में न पड़े| एक सच्चा संन्यासी वैसे भी भौतिक सुख-सुविधाओं को त्याग कर ही संन्यासी बनता है| अतः वह धार्मिक क्षेत्र में ही अपना अमूल्य जीवन बिताने की प्रतिज्ञा लेता है| वह सांसारिक प्रपंचों से मुक्त हो जाता है| संक्षेप में एक संन्यासी तीनों ऐषणाओं से ऊपर होता है| एक संन्यासी को भौतिक नश्वर वस्तुओं में राग (आकर्षण) नहीं होता क्योंकि उसका बस एक ही लक्ष्य होता है मुक्ति प्राप्त करना, ईश्वर के सान्निध्य में रहकर आनन्द प्राप्त करना| शतपथब्राह्मण में लिखा है-ब्रह्मा, होता, अर्ध्वयु तथा उद्गाता पश्चिम (भौतिक संसार) की ओर चलते है अर्थात् संन्यासी पूर्व (अभौतिक मोक्ष) की ओर चलता है अर्थात् संन्यासी का मार्ग दूसरों से भिन्न होता है| संसारी लोग भौतिक वस्तुओं की ओर भागते हैं परन्तु एक सच्चा संन्यासी पारलौकिक आनन्द की खोज में रहता है| यहाँ स्पष्ट है की संन्यासी और अन्य लोगों के कर्तव्य/उद्धेश्य भिन्न-भिन्न होते हैं| कात्यायनसूत्र (१.२.४) में लिखा है ‘सर्वेंषा-यज्ञोपवीत्योदकाचमते नित्येकर्मोपयाताम्’ अर्थात् यज्ञ के ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु और उद्गाता इत्यादि को अनिवार्यरूप से यज्ञ प्रारम्भ से पूर्व यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये और तीन ‘आचमन’ (जल के तीन बार घूँट पीने की क्रिया) करनी चाहिये| ‘ यज्ञ के ब्रह्मा के लिये यज्ञाग्नि में अपनी आहुति प्रदान करने का विधान है’(गोपथब्राह्मण)| बलिवैश्वदेव-यज्ञ की १६ आहुतियाँ होती हैं, उनमें से 10 आहुतियाँ चूल्हे से अग्नि अलग धर के उसमें बलिवैश्वदेव-यज्ञ किया जावे| शेष ६ भाग किसी दुःखी बुभुक्षित प्राणी अथवा कुत्ते आदि को दे देवें| (स. प्र.) यहाँ कुत्ता, कौवा, चींटी आदि प्रतीक मात्र हैं, वास्तव में परमात्मा के बनाये समस्त प्राणी किसी न किसी रूप में मनुष्यों के लिये हितकारी होते हैं| अतः जहाँ तक हो सके उनकी रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है और उनकी बिना कारण हिंसा करना पाप है| “कुत्तों, कंगालों, कुष्टी आदि रोगियों, काक आदि पक्षियों और चींटी आदि कृमियों के लिये छः भाग अलग-अलग बाँट के दे देना और उनकी प्रसन्नता करना| अर्थात् सब प्राणियों को मनुष्य से सुख होना चाहिये|” वर्तमान में भारत में ही नहीं, विदेशों में भी ‘महायज्ञ’ के नाम से अनेक यज्ञों का आयोजन पूर्ण श्रध्दा और प्रेम से किया जाता है| निश्चित रूप से यह एक शुभ संकेत है कि इस पृथ्वी पर रहने वाले अधिक से अधिक लोग वैदिक धर्म (मानव-धर्म) और वैदिक सिध्दान्तों की ओर आकर्षित होकर अपना रहे हैं| धार्मिक सज्जन अवश्य जान लें कि वैदिक मान्यतानुसार महायज्ञ पाँच ही होते हैं| यज्ञ के तीन प्रधान अंग हैं संकल्प, मन्त्र और आहुति| संकल्प के बिना यज्ञ नहीं हो सकता, मंत्रोच्चारण बिना यज्ञ नहीं हो सकता और यज्ञाग्नि में आहुतियाँ प्रदान किये बिना भी यज्ञ (हवन/अग्निहोत्र) पूर्ण नहीं हो सकता| इन तीनों का समन्वित कार्य ही यज्ञ कहाता है| यजमान का आसन यज्ञकुंड के पश्चिम (मुख पूर्व) में होता है और उसकी धर्मपत्नी उसके दाहिनी ओर बैठती है| यजमान को ‘याजक’ और उसकी धर्मपत्नी को ‘यज्वा’ कहते हैं| वर्तमान में हम देखते हैं कि यज्ञकुंड के चारों ओर यग्यप्रेमी दम्पति बैठते हैं वे अतिथि या दर्शक होते हैं, यजमान नहीं| रही बात चारों कोनों में बैठे बारी-बारी से आहुतियाँ देने की, तो यह अवैदिक है| यज्ञाग्नि में गोघृत तथा सामग्री (विभिन्न प्रकार के सुगन्धित पदार्थ तथा औषध गुणों से भरपूर जड़ी-बूटियों का मिश्रण) की आहुतियों से निकलने वाली सूक्ष्म गंध वायु को शुध्द करती है और यह वायु देश-विदेश में जाकर सब प्राणधारी (जीवों) को स्वास्थ्य लाभ पहुँचाती है| यह सर्वश्रेष्ट परोपकारी कार्य है क्योंकि इससे अपने हों या पराये, मित्र हों या शत्रु सबको लाभ पहुँचता है| सब प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते है| यज्ञाग्नि से उठने वाले धुएँ से पेड़-पौधों तथा वृक्षों में भरपूर खुराक मिलती है| यज्ञाग्नि में आहूत पदार्थ (घृत और सामग्री) सूक्ष्म होकर वायु द्वारा आकाश में भेदन शक्ति उत्पन्न करके वर्षा करते हैं और वही पदार्थ वर्षा के जल द्वारा भूमि को प्राप्त होते हैं, जिससे फसल (उपज) अधिक और पौष्टिक होती है| यज्ञ से यजमान तथा यज्ञ में भाग लेने वाले अतिथियों के मन में नकारात्मक विचार समाप्त होते हैं तथा उनमें सकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगते हैं| यजमान का आसन यजमान के लिये सुरक्षित होता है और उसके दाहिनी ओर उसकी धर्मपत्नी बैठती है और यदि यजमान उसका (पुरुष या स्त्री) अकेला/अकेली है तो उसके साथ में उसका भाई, मित्र या रिश्तेदार बैठ सकता है| स्मरण रहे कि पुरुष के दाहिनी ओर केवल उसकी धर्मपत्नी ही बैठ सकती है, अन्य कोई स्त्री (बहन, भाभी, माँ) नहीं|अन्य आसनों पर भी ऐसा ही समझना चाहिये| बहन, भाभी या अन्य कोई को पुरुष के बाईं ओर ही बैठना उचित है, ऐसा आर्ष ग्रंथों में वर्णित है| वैदिक संस्कारो में ऐसा ही विधान है| जो बात सत्य (वेदोक्त) है उसको वैसा जानना,मानना और व्यवहार में लाना ही सही मायनों में सत्य कहता है| कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वाध्याय नहीं करते और केवल ‘अहम्’ को प्रसन्न करने हेतु या दूसरों पर जमाने हेतु आर्ष ग्रंथों की प्रामाणिक बातों को नहीं मानते और बेतुके तर्क और छल से अपनी बात को ही ठीक समझते हैं, ऐसे लोग स्वयं तो डूबते ही हैं दूसरों को भी अज्ञानता की गहरी खाई में धकेलते हैं| यह घोर अपराध है| यह अहंकार/अभिमान/स्वार्थ का प्रतिक है तथा लोकैषणा को दर्शाता है| समय पर पधारने वाले अतिथियों का सम्मान अवश्य करना चाहिये| यज्ञ की विधि प्रारम्भ होने के पश्चात् आने वाले व्यक्ति को भी योग्य है कि वह चुप-चाप आकर शान्ति से जहाँ रिक्त स्थान दिखाई दे वहाँ बैठ जाए| किसी को इशारे से भी नमस्ते न करे| जिसे हम परोपकार की भावना से यज्ञ में शामिल हुए हैं, दत्तचित्त होकर अपना पूरा ध्यान उसी में लगाएँ| याद रहे की मन एक समय में केवल एक ही काम करता है और वह अत्यन्त चंचल होने के कारण बहुत विचलित हो जाता है तथा दोबारा नियन्त्रित करना कठिन होता है| हमें अपने अतिथियों से या सगे-संबंधियों से मिलने के अनेक अवसर मिलते हैं, यज्ञ के बीच में उनको नमस्ते करना या मुस्कराहट देना, इससे यह प्रतीत होता है कि आप यज्ञ वेदी पर मात्र दिखावे के लिये बैठे हैं| अथर्ववेद (१.7.६ से मन्त्र सं० 19 तक) में अनेक यज्ञों का वर्णन आया है और चारों वेदों के २०३७६ मंत्रों में से एक भी ऐसा मंत्र नहीं है जिससे बहुकुंडीय यज्ञ करने का विधान प्रमाणित होता हो| वैदिक धर्म (मिमान्सादर्शन के अनुसार) में पाँच प्रकार की अग्नियों का वर्णन आया है| १. गार्हपत्य, २. आहवनीय, ३. दक्षिण (श्रौत अग्नियाँ), ४. सभ्या और ५. वसथ्य| श्रौत यज्ञ में पाँच अग्नियों के पाँच यज्ञकुंड होते हैं परन्तु इनमें भी मुख्य आहवनीय कुण्ड एक ही होता है जिसमें आहुतियाँ दी जाती है शेष चार कुण्ड यज्ञादि कर्मकांड पूर्ण करने के लिये होते हैं| लोगो ने इसे बहुकुंडीय यज्ञ समझ लिया है जो अवैदिक, अवैज्ञानिक, अशास्त्रीय तथा एक प्रकार का पाखण्ड है जो मात्र स्वार्थपूर्ति का एक जरिया है| बहुकुंडीय यज्ञो का समर्थन करना अशिक्षा, अस्वाध्याय तथा ऐषणाओ में लिप्तता का परिणाम है| किसी विशेष अवसर पर यज्ञ के मुख्य यजमानों की संख्या बहुत अधिक है और सब यजमान बनना चाहते है तो ऐसी परिस्थति में बहु-कुण्डीय यज्ञ का आयोजन करने-कराने में कोई त्रुटी न हो परन्तु ऐसा सम्भव नहीं हो सकता क्योंकि ब्रह्मा एक और यजमान अनेक| एक ब्रह्मा सर्वव्यापक नहीं हो सकता जो सब ओर ध्यान दे पावे| अतः यज्ञ में गलती होने से लाभ के स्थान पर हानि ही होती है| यज्ञ के ब्रह्मा को पूरा उत्तरदायित्व निभाना पड़ेगा कि यज्ञकर्म में किसी भी यजमान से यज्ञ के अंतर्गत कोई त्रुटी न हो और यह एक ब्रह्मा के लिये सम्भव नहीं है| देश-काल-परिस्थिति को ध्यान में रखकर यदि बहुकुंडीय यज्ञो का आयोजन करना पड़े तो सब कुंडों के पास सुशिक्षित यज्ञ मार्गदर्शक उपस्थित होने चाहियें, जो समय-समय पर नये आमंत्रित यजमानों को ठीक तरह से यज्ञ की विधियाँ समझा सकें, जिससे नये यजमानों की यज्ञ के प्रति आस्था बनी रहे और यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो सके परन्तु सर्वविदित प्रत्यक्ष प्रमाण है कि ऐसा होना सम्भव नहीं है| मैंने ऐसे अनेक यज्ञो में भाग लिया है और खेद के साथ लिखना/कहना पड़ता है कि इस प्रकार के बहुकुंडीय यज्ञों में अनेक बार धुआँ होता है, सब यज्ञकुण्डों पर घी तथा सामग्री की व्यवस्था में विलम्ब होता है और यज्ञ प्रक्रिया को अनेक बार कुछ समय इतना होने के बाद भी घोषणा की जाती है कि ‘ईश्वर की असीम कृपा से यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ|’ यज्ञ के ब्रह्मा के द्वारा यह सरासर अधर्म है| यज्ञ करना सर्वश्रेष्ट केम और धर्म है परन्तु जिस बात की चर्चा (बहुकुंडीय यज्ञो की चर्चा) यदि हमारे आर्ष ग्रंथों में नहीं है तो हमें उस वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहिये| जिन लोगो को बहुकुंडीय यज्ञ करना अच्छा लगता है, क्योंकि उससे उनकी प्रसिध्दि होती है तथा ब्रह्मा को भी अधिक मात्र में दान-दक्षिणा मिलती है तो कोई क्या कर सकता है! आजकल लोगो का झुकाव धर्म से अधिक धन की ओर बढ़ रहा है क्योंकि उन्हें लक्ष्य नहीं लक्ष्मी चाहिये| अपनी-अपनी समझ है| वैदिक यज्ञ में बहुकुंडीय यज्ञ नहीं होता और जहाँ होता है वहाँ अवैदिक एवं गलत ढंग से होता है| हमारे ऋषियों ने कहीं भी बहुकुंडीय यज्ञो का विधान नहीं बताया है| अतः बहुकुंडीय यज्ञों का निषेध करना चाहिये| सत्य के साथ कभी समझौता नहीं करना चाहिये| बहुकुंडीय यज्ञ हर द्रष्टिकोण से अवैदिक एवं अवैज्ञानिक है अतः उसका बहिष्कार अवश्य करना चाहिये| यज्ञकर्म की परिधि ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ तक ही सीमित है अर्थात् सन्यासाश्रम में नहीं| गृहस्थी ब्राह्मण अर्थात् जो वैदिक विद्वान गृहस्थ में रहता है, वही सभी वैदिक संस्कारों को (पुरोहित के कार्यो को) करा सकता है| ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ स्वयं यज्ञ कर सकते हैं| परन्तु दूसरो के यहाँ पुरोहित बनकर नहीं करा सकते | दूसरी ओर एक सन्यासी न स्वयं यज्ञ कर सकता है न ही दूसरो के लिये यज्ञ कर्म करा सकता है| केवल गृहस्थी पुरोहित ही दूसरों के लिये यज्ञकर्म करा सकता है| सन्यासाश्रम को उच्चकोटि का आश्रम मन जाता है क्योंकि स्वर्ग की कामना करने वाले लोग तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य,गृहस्थ और वानप्रस्थ) में रहते हैं अतः कहते है कि स्वर्ग की कामना करने वाले लोग यज्ञ किया करें| वैदिक धर्म में सन्यासी को यज्ञ अर्थात् कर्मकांड न करने की पूरी छुट प्राप्त है क्योंकि यज्ञ भी एक प्रकार का कर्मकांड ही है और वैसे भी सन्यासाश्रम में प्रवेश करने से पूर्व, सन्यासाश्रम की दीक्षा ग्रहण करते समय, उनका धारण किया हुआ यज्ञोपवीत उतार दिया जाता है अर्थात् इसके बाद वह सन्यासी भविष्य में यज्ञकर्म करने से पूर्णरूपेण मुक्त है| दूसरे अर्थों में यज्ञ करने का आदिकर मात्र यज्ञोपवीत धारण करने वाले महानुभाव को यज्ञोपवीत धारण करना अनिवार्य होता है| एक सच्चे संन्यासी का यह विशेष और आवश्यक कर्तव्य है कि वह प्रतिदिन प्राणायाम करे| एक स्थान पर न रुके अपितु सब स्थान जाकर समाज के अन्य वर्गों तथा वर्णों के लोगों में वेद-ज्ञान का प्रचार-प्रसार करता रहे| समाज की राजनीति में न पड़े| एक सच्चा संन्यासी संसार की सुख-सुविधाओं को स्वेच्छा से त्याग कर अपनी आत्मोन्नति के मार्ग पर चलकर आध्यात्मिक क्षेत्र में पहुँच चुका होता है| उसका ध्येय है-आत्म निरीक्षण करना, परमात्मा का साक्षात्कार (आनन्द की अनुभूति) करना| वह ऐसी स्थिति में पहुँच चुका है कि उसे सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव या उसकी इच्छा नहीं होती| अब वह मुक्ति के मार्ग का राही है| यह सब सोच-समझ कर ही वह संन्यासाश्रम को ग्रहण करता है| कर्म का फल तीन प्रकार से प्राप्त होता है-१ . फल २. परिणाम और ३. प्रभाव| यज्ञ एक प्रकार का विज्ञान है और विज्ञान सबके उपकार या लाभ के लिये होता है| कर्म का फल सदैव कर्ता को ही प्राप्त होता है और जैसे कि यज्ञ का कर्ता यजमान होता है अतः यज्ञ का फल यजमान को ही प्राप्त होता है| यज्ञ का परिणाम है वायुमंडल को शुद्ध पवित्र करना| यज्ञ का प्रभाव सब जीवों पर पड़ता है और मुख्यतः यज्ञ में भाग ले रहे सभी अतिथियों पर अवश्य रूप से पड़ता है और उसका लाभ पहुँचाता है|

यज्ञ से आत्मोन्नति होती है, सबके प्रति प्रेम और श्रद्धा उत्पन्न होती है, मन में शान्ति का वास होता है, बिगड़े काम सँवर जाते हैं तथा उलझे काम सुलझ जाते हैं, घर में सुख-समृद्धि शान्ति आती है तथा स्वास्थ्य लाभ होता है, अर्थात् यज्ञ से सबका, सब प्रकार से भला ही भला होता है| जिससे हम या हमसे जो जाने-अनजाने में अहित या द्वेष करता है यज्ञ से उसका भी कल्याण होता है| यज्ञ एक प्रकार का विज्ञान (विशेष-ज्ञान) है, जिसके अनेक लाभ होते हैं और हानि किंचित् मात्र भी नहीं होती अतः यज्ञ करना सर्वश्रेष्ठ कार्य है जो सब मनुष्यों को करना चाहिये|