शास्त्रकारों ने ऐसे ४० मोड़ों को तलाशा उनमें से १६ को प्रमुख मानकर षोडश संस्कारों का प्रचलन किया। जिस तरह उपवन के पौधों और जंगली पेड़ों में एक मूलभूत अंतर होता है। उद्यान के वृक्ष स्वस्थ सुडौल और अधिक फल देते हैं, जबकि जंगली पेड़ों की डालें, तने सब अनगढ़ और अव्यवस्थित होते हैं। यह अंतर देखभाल करने वाले माली के पुरुषार्थ का प्रतिफल होता है। वह न केवल समय पर खाद–पानी देता है, अपितु काट–छाँट भी करता रहता है। संस्कार परम्परा भी व्यक्तित्व को निखारने की ऐसी ही स्वस्थ कला है। जो चिन्ह-पूजा के रूप में चल तो आज भी रही हैं, पर उनसे जुड़े लोकशिक्षण ने अब मात्र कर्मकाण्ड या खाने-पीने और मौज मनाने वाले कार्यक्रमों का रूप धारण कर लिया है। अतएव कुछ प्रतिफल नहीं निकल पाता है, ऐसी धारणा बनती जा रही है। पाँच माह की अवस्था में भू्रण का मस्तिष्क भाग बनना प्रारंभ होता है। यह एक तरह का शरीर का राज्याभिषेक पर्व है। पाँच माह में पुंसवन मनाने की परम्परा इसीलिए पड़ी। बीज को संस्कारित कर देने से पौधे स्वस्थ होते हैं यही इनका उद्देश्य है। हिन्दू संस्कार के अनुसार गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णभेद व विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह, अन्त्योष्ट और श्रद्धा यह सभी एक से एक बढ़कर महत्व आत्मसात किए हुए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी संस्कार उस आयु और अवस्था में सम्पन्न होते हैं जब उस तरह के विशेष मार्गदर्शन प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए बच्चे के शरीर का “हारमौनिक विकास ८ से १३ वर्ष की आयु में होता है। यह आयु जीवन का सबसे नाजुक मोड़ होती है। इसी आयु में अधिकांश बच्चे बिगड़ते हैं अतएव इसी आयु में यज्ञोपवीत या वृत-बंध रखा गया।” ब्रह्मचर्य आश्रम में इन सब बातों का विचार है। हमें क्या खाना चाहिए, क्या सुनना चाहिए, क्या देखना चाहिए, क्या पढ़ना चाहिए, वैसे बैठना चाहिए, कब उठना चाहिए आदि सब बातों का विवेकपूर्ण निश्चय करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का भी एक शास्त्र है। ब्रह्मचारी बननेवालों को उस शास्त्र के अनुसार आचरण करना चाहिए। इसीलिए गाँधीजी हमेशा कहते थे कि ब्रह्मचर्य किसी एक इन्द्रय का संयम नहीं है। ब्रह्मचर्य जीवन का संयम है। ब्रह्मचर्य का पालन उसी समय संभव है जबकि कान, आँख, जबान आदि सभी इन्द्रयों का संयम किया जाय।

ब्रह्मचर्य पालन करने की बात आजकल बहुत कठिन हो गई है। चारों ओर का वातावरण बड़ा दूषित हो गया है। सबके मन मानो खोखले हो गए हैं। सब जगह ढीलढाल और पोलपाल आ गई है। ब्रह्मचर्य आश्रम में मानो पुनर्जन्म है। अब संयमी होना चाहिए। ध्येय की उपासना करनी चाहिए। अग्नि में समिधा होम देने के बाद ब्रह्मचारी को जो प्रार्थना बोलनी चाहिए वह है- हे अग्नि मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और तेज दे। इन्द्र मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और सामथ्र्य दे। सूर्य मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और तेज दे। हे अग्नि ! मुझे अपने तेज से तेजस्वा होने दे। अपने विजयी तेज सा मुझे महान बनने दे। मलिनता को भस्म कर देने वाले अपने तेज से मुझे भी मलिनता को भस्म करने वाला बनने दे। मेखला और कौपीन धारण करके बटु हाथ में दण्ड लेता है। उस समय वह कहता है|मुझे असंयमी को यह दण्ड संयम सिखाए। हे दण्ड! जब कहीं मुझे डर लगे तब तू उससे मेरा उद्धार कर। उपनयन के अंत में जो मेधासूक्त बोलते हैं, संयमी ज्ञानवान गुरु इसे उन्नति की ओर ले जाए। यह तरुण अध्ययन करके, मन को एकाग्र करके देवताओं का प्यारा बने, तेजस्वी बने।

हम यज्ञोपवीत पहनते हैं। उसका पहले अर्थ कुछ भी रहा हो। मुझे तो उसके तीन धागों में एक बहुत बड़ा अर्थ दिखाई दिया। कर्म, भक्ति और ज्ञान के तीन धागे ही मानो यह जनेऊ है। इन तीनों को एकत्र करके लगाई हुई गाँठ ही ब्रह्मगाँठ है। जब हम कर्म, ज्ञान और भक्ति को एक दूसरे के साथ जोड़ेंगे, तभी ब्रह्म की गाँठ लग सकेगी। केवल कर्म से, केवल ज्ञान से, केवल भक्ति से ब्रह्मगाँठ नहीं लग सकेगी। पूल की पँखुड़ी, उसके रंग और उसके गंध में जिस प्रकार का एक ही भाव है, और जिस प्रकार दूध, शक्कर और केशर को हम एक कर लेते हैं उसी प्रकार कर्म, ज्ञान और भक्ति को भी एक बना लेना चाहिए। बीज तुच्छ है किन्तु वह जिस पेड़ का अंश है उसी स्तर तक विकसित होने की संभावनाएँ उसमें पूरी तरह विद्यमान हैं। बीज को अवसर मिले तो वह अपनी मूलसत्ता वृक्ष के समान फिर विकसित हो सकता है। जीवात्मा की प्रखरता बढ़ता रहे तो उसकी विकास प्रक्रिया उसे महात्मा-देवात्मा एवं परमात्मा बनन की स्थति तक पहुँचा सकती है। इन सब पर्वों, उत्सवों, संस्कारों एवं अन्य सामूहिक आयोजनों में यज्ञ का कार्यक्रम निश्चत रूप से जुड़ा रहता था, जिसका उल्लेख शास्त्रों में विभिन्न स्थानों पर किया गया है। यज्ञ के ज्ञान एवं विज्ञान के सिद्धांत की अवधारणा से ही स्वर्णिम परिस्थतियों का सृजन संभव हो सका था। जन्म के बाद जात कर्म, नामकरण, अन्नप्रशासन, मुण्डन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत आदि कई संस्कार हैं जो बचपन की आयु में जल्दी-जल्दी सम्पन्न किए जाते रहते हैं। इन सब में यज्ञ अनिवार्य है। इससे बालक को और उसके निरन्तर सम्पर्व में आने वाले मातापिता व रिश्तेदारों को साम्मलित होना पड़ता है। इससे शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों के उत्पन्न होने की आशंका का पूर्व निराकरण हो जाता है। यज्ञ के द्वारा मनुष्य की आत्माग्न प्रदीप्त होती है। आत्मााqग्न के प्रदीप्त होने से परमात्मा प्रसन्न होते हैं और वह प्रसन्न होकर यज्ञकर्ता के समस्त मनोरथों को पूर्ण करते हैं (२/१४ शुक्ल यजुर्वेद) यज्ञ की अग्नि हविद्र्रव्य प्रदान करनेवाले को अत्यंत यशस्वी, ज्ञानी, विजयी और श्रेष्ठ वाग्मी (वक्ता) बनाती है और सर्वगुणसम्पन्न पुत्र प्रदान करती है (५/२५/५ ऋग्वेद)

ब्रह्मचारी बनने वालों को उस शास्त्र के अनुसार आचरण करना चाहिए। इसीलिए गाँधीजी हमेशा कहते थे कि ब्रह्मचर्य किसी एक इन्द्रिय का संयम नहीं है। ब्रह्मचर्य जीवन का संयम है। ब्रह्मचर्य का पालन उसी समय संभव है जबकि कान, आँख, जबान आदि सभी इन्द्रिय का संयम किया जाय। ब्रह्मचर्य पालन करने की बात आजकल बहुत कठिन हो गई है। चारों ओर का वातावरण बड़ा दूषित हो गया है। सबके मन मानो खोखले हो गए हैं। सब जगह ढीलढाल और पोलपाल आ गई है। ब्रह्मचर्य आश्रम में मानो पुनर्जन्म है। अब संयमी होना चाहिए। ध्येय की उपासना करनी चाहिए।

अग्नि में समिधा होम देने के बाद ब्रह्मचारी को जो प्रार्थना बोलनी चाहिए वह है- हे अग्नि मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और तेज दे। इन्द्र मुझे बुद्धि,विचारशक्ति और सामथ्र्य दे। सूर्य मुझे बुद्धि, विचारशक्ति और तेज दे। हे अग्नि! मुझे अपने तेज से तेजस्वी होने दे। अपने विजयी तेज से मुझे महान बनने दे। मलिनता को भस्म कर देने वाले अपने तेज से मुझे भी मलिनता को भस्म करने वाला बनने दे। मेखला और कौपीन धारण करके बटु हाथ में दण्ड लेता है। उस समय वह कहता है- मुझे असंयमी को यह दण्ड संयम सिखाए। हे दण्ड! जब कहीं मुझे डर लगे तब तू उससे मेरा उद्धार कर। उपनयन के अंत में जो मेधासूक्त बोलते हैं, संयमी ज्ञानवान गुरु इसे उन्नति की ओर लेजाए। यह तरुण अध्ययन करके, मन को एकाग्र करके देवताओं का प्यारा बने, तेजस्वी बने।