गोरीष धूप-यज्ञ-हवन सामग्री में 150 हर्बल का मिश्रण है। विभिन्न प्रकार की सामग्री का प्रयोग करने का आदेश हमारे शास्त्रों ने दिया है, इस सामग्री में कुछ सुगंध बढाने वाली बूटियाँ डाली जावें। सामग्री का कुछ भाग पोष्टिक पदार्थों से बनाया जावे। इसके अतिरिक्त एक भाग रोग नाशक जड़ी बूटियाँ भी एक निश्चत मात्रा में डालने के लिए कहा गया है। गौरीश धूप, यज्ञ, हवन सामग्री में जब हम यह सब पदार्थ एक निश्चित अनुपात में मिला कर सामग्री तैयार करते हैं। इस सामग्री से हमारा वायु मंडल शुद्ध हो कर सुगंध से परिपूरित हो जाता है । हमारा शरीर इस यज्ञ के वायु से, इस यज्ञ के धुएं को वायुमंडल से प्राप्त कर पुष्टि को प्राप्त होता है । इस सब के साथ ही साथ जब इस प्रकार के यज्ञ के वायु क्षेत्र में हम निवास करते हैं तो हमारे शरीर के अन्दर निवास करने वाले रोग के कीटाणुओं का नाश होने लगता है तथा हम अनेक प्रकार के रोगों से बच जाते हैं।

‘यज्ञ’ शब्द यज-धातु से सिद्ध होता है जिसका अर्थ है देव पूजा, संगतिकरण और दान। संसार के सभी श्रेष्ठकर्म यज्ञ कहे जाते हैं। यज्ञ को अग्निहोत्र, देवयज्ञ, होम, हवन भी कहते हैं। अग्नि में डाला हुआ पदार्थ सूक्ष्म होकर फैल कर वायु के साथ दूर देश में जाकर दुर्गंध की निवृत्ति करता है। इससे वायु, वृष्टि, जल की शुद्धि होकर, खाद्य सामग्री व वनस्पतियाँ शुद्ध होती हैं। शुद्ध वायु का श्वास स्पर्श, खान-पान से आरोग्य, बुद्धि, बल पराक्रम बढ़ता है। इसे ‘देवयज्ञ’ भी कहते हैं क्योंकि यह वायु आदि पदार्थों को दिव्य कर देता है।’ पर्यावरण को शुद्ध बनाने का एकमात्र उपाय यज्ञ है। यज्ञ प्रकृति के निकट रहने का साधन है। रोग-नाशक औषधियों से किया यज्ञ रोग निवारण वातावरण को प्रदूषण से मुक्त करके स्वस्थ रहने में सहायक होता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी परीक्षण करके यज्ञ द्वारा वायु की शुद्धि होकर रोग निवारण की इस वैदिक मान्यता को स्वीकार किया ।

यज्ञ से रोगाणुओं अर्थात कृमियों का नाश हो जाता है। येरोगजनक कृमि पर्वतों, वनों, पशुओं और जल में रहते हैं जो हमारे शरीर में अन्न और जल के साथ जाते हैं। यज्ञ से शुद्ध हुई जलवायु से उत्पन्न वायु, अन्न और वनस्पतियाँ आदि भी शुद्ध एवं निर्दोष होते हैं। वायु, जल आदि जो देव हैं वे यज्ञ से शुद्ध हो जाते हैं, आकाश मंडल निर्मल और प्रदूषण मुक्त हो जाता है। यही उन देवताओं का सत्कार और पूजा है। अग्रि में समर्पित पदार्थ आकाश मंडल में पहुंच कर मेघ बनकर वर्षा में सहायक होते हैं। वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा की तुष्टि-पुष्टि होती है। इस प्रकार जो अग्निहोत्र करता है वह मानो प्रजा का पालन करता है।

जब हम यज्ञ को केवल एक परिपाटी मान लेते हैं। अंधविश्वास मान कर इस में किसी भी प्रकार की लकड़ी का प्रयोग करते हैं , किसी भी दुर्गन्ध से युक्त बूटियों को यज्ञ में प्रयोग करते हैं। कैसा भी तैल या घी हम यज्ञ में प्रयोग करते हैं तो वायु मंडल में आने वाले प्रतिफल तो उस वस्तु के अनुरूप ही होगा , जो उस में डाली जा रही होगी। देखने और सुनाने में हम ने एक परिपाटी को पूर्ण करते हुए दिखावे का यज्ञ तो कर लिया किन्तु आध्यात्मिक, आयुर्वेद की दृष्टि से जिसे यज्ञ कहा गया है , वेदादि शास्त्रों में जिसे यज्ञ कहा गया है , वह यज्ञ हमने नहीं किया, इस प्रकार की अनुपयुक्त वस्तुओं के कारण यज्ञ का जो हितकारक परिणाम हमें मिलने वाला था , वह नहीं मिला पाता। इस प्रकार के यज्ञ के कारण हमारे शरीर को अनेक प्रकार के संकट आ घेरते हैं।

शास्त्रों ने यज्ञ करने के जो लाभ बताएं हैं , वह न मिलने से हम यज्ञ से भागने लगते है किन्तु यह दोष यज्ञ का न होकर हमारा ही दोष होता है, हम प्रतिदिन दो काल यज्ञ करें और इस यज्ञ में शास्त्रोक्त समिधा, शास्त्रोक्त घी तथा शास्त्रोक्त सामग्री का ही प्रयोग करें तो कोई कारण नहीं कि इस यज्ञ का शास्त्र में बताये अनुसार लाभ हमें न मिले। यह लाभ निश्चित रूप से हमें मिलेगा। बस हम बड़ी श्रद्धा से उतम घी का, उत्तम समिधा का तथा उतम सामग्री का प्रयोग इस यज्ञ के अन्दर करें। इस प्रकार से परमात्मा प्रसन्न होगा तथा इसके उत्तम परिणाम हमें देगा। अगर आप नित्य यज्ञ नहीं कर सकते पर शुद्ध धूप तो  नित्य लगा सकते हैं, जिससे शरीर, मन, प्राण, ब्रह्मचर्य, पवित्रता , प्रसन्नता, अाज, तेज, बल, सामथ्र्य, चिरयोवन और  चिरउल्लास बना रहता है।