भारतीय संस्कृति यज्ञ प्रधान है। वेद, रामायण, महाभारत आदि धार्मिक तथा एतिहासिक ग्रन्थो  में यज्ञ को  ही सवर्च्च स्थान दिया गया है। यज्ञ करने से पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाष इन पंचभूतो  की शुद्धि होती है। पंचभूतो  के सामंजस्य से मानव शरीर बना है। अतः शरीर को  सुरक्षित रखने के लिए पंचभूतो  का शुद्ध रूपो  में उपयोग आवष्यक ही नहीं अनिवार्य है।

यज्ञ की उष्मा से व्यक्ति का संपर्क होने पर वह मानोविकार मुक्त होता है। मनुष्य विचारवान और चरित्रवान बनता है। मानव में बृद्धि बल बढने से भावनाओं में उत्कृष्टता आती है। आज के समय में हमारी अधिकांश चिंताओं का हल यज्ञ से हो सकता है। मनुस्मृति में कहा गया है कि यज्ञ के संपर्क में आने से ब्राहाणत्व का उदय होता है। ऐसा इसलिये कहा गया है क्योंकि यज्ञ की उष्मा से व्यक्ति का संपर्क होने पर वह मनोविकार मुक्त होता है। मनुष्य विचारवान और चरित्रवान बनता है। मानव में बुद्धि बल बढने से भावनाओं में उत्कृष्टता आती है। नए समय में हमारी अधिकांश चिंताओं का हल यज्ञ से हो सकता है। यह एक वैज्ञानिक हल जिससे हम अपनी परेशानियों से पार पा सकते है। यज्ञ वातावरण मानसिकता और शरीर को पुष्ट करने का काम करता है। और हमारे जीवन में आनेद का संचार करता है। यज्ञ से जीवन में उत्साह बना रहता है।

पर्यावरण का धर्म रहस्यमयी विज्ञान है। मानवीय स्वास्थ हमारी देह की भौतिक तथा मानसिक स्थिइतो  के साथ-साथ उर्जास्विता पर भी निर्भर करता है। जब हमारे चारो और  का ऊर्जा क्षेत्रों का  श्रेयस, साकरात्मक और  प्रभावषाली होता है तो  हम भी पूर्ण उत्साहित, उल्लासित तेजस्वित एवं आनंदित रहते हैं।