क्या कभी आपने विचार किया है ?

दीप, धूप, अगरबत्ती क्यो जलाते हैं ?

पर्व गांठ जोड़ संधि समय में इन्हें क्यो जलाया जाता है ?

पूजा पाठ मेडिटेषन में इनका क्या उपयोग है ?

हम शाम के समय दिया बत्ती क्यो करते हैं ?

क्या आप सिर्फ सांकेतिक पूजा करते हैं ?

 

सवाल करें… अपने आप से?

अगरबत्ती का प्रयोग, फैलाता रोग ये कहां जा रहे हम… ?

अगरबत्ती एवं धूपबत्ती के धुएं में पाए जाने वाले पॉलीएरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) की वजह से पुजारियों में अस्थमा, कैंसर, सरदर्द एवं खांसी की गुंजाइश कई गुना ज्यादा पाई गई है। शास्त्रो में बांस की लकड़ी जलाना वर्जित है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष बनता है। शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता सब जगह धूप ही लिखा हुआ मिलता है। अगरबत्ती तो केमिकल से बनाई जाती है। खुशबूदार अगरबत्ती को घर के अंदर जलाने से विशेष रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड निकलने से वायु प्रदूषण होता है। फेफड़ों की कोशिकाओं में सूजन आ सकती है और श्वसन से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं। अतिसंवेदनशीलता के कारण कफ और छीकनें की समस्या हो जाती है। वैज्ञानिकों ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि बांस जलाने पर जो धुंआ होता है, जो हमारी प्रजनन क्षमता को कम करता है। फेफड़ों में धुंए के कण जमा होने के कारण शरीर को आक्सीजन बहुत कम मिलती है।

 

शरीर में विषाक्त पदार्थों को करती है : जमारू अगरबत्ती के धुएं में लेड (सीसा), आयरन और मैग्नीशियम होता है जिसके कारण शरीर में विषाक्त पदार्थों की मात्रा बढ़ती है। उसके कारण रक्त में अशुद्धियों की मात्रा बढ़ जाती है।

अस्थमा का खतरा : इन अगरबत्तियों में सल्फर डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन और फॉर्मल्डेहाईड (कण तथा गैस के रूप में) होते हैं जिनके कारण नियमित रूप से इसके संपर्क में रहने पर श्वसन से संबंधित बीमारियाँ जैसे ब्व्च्क् और अस्थमा हो सकती हैं। इस समय श्वसन के माध्यम से जो धुंआ फेफड़ों में जाता है वह धूम्रपान के समय फेफड़ों में जाने वाले धुएं के समान होता है।

ऑँखों और  त्वचा की ऐलर्जी  : अगरबत्तियों का उपयोग करने से आँखों में विशेष रूप से बच्चों तथा वृद्ध व्यक्तियों की आँखों में जलन होती है। इसके अलावा संवेदनशील त्वचा वाले लोग भी जब नियमित तौर पर अगरबत्ती के जलने से निकलने वाले धुएं के संपर्क में आते हैं तो उन्हें भी त्वचा पर खुजली महसूस होती है यह तंत्रिका से संबंधित लक्षण सक्रिय करती है नियमित तौर पर अगरबत्ती का उपयोग करने से जो समस्याएं आती हैं उनमें सिरदर्द, ध्यान केंद्रित करने में समस्या होना और विस्मृति आदि शामिल है। रक्त में जानलेवा गैसों की मात्रा बढ़ने से मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रभावित करती हैं, जिसके कारण तंत्रिका से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं।

श्वसन कैंसर हो  सकता हे  : क्या आपने कभी सोचा है कि अगरबत्ती का उपयोग करने से श्वसन मार्ग का कैंसर हो सकता है? लंबे समय तक अगरबत्ती का उपयोग करने से ऊपरी श्वास नलिका का कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। यह भी साबित हुआ है कि अगरबत्ती का उपयोग करने साथ साथ, धूम्रपान करने वालों में भी ऊपरी श्वास नलिका के कैंसर की संभावना सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होती है। 

दिल को नुकसान पहुँचाती है ?: लम्बे समय तक अगरबत्तियों का उपयोग करने से हृदय रोग से होने वाली मृत्यु की दर 10 प्रतिषत से 12 प्रतिषत तक बढ़ जाती है। इसका मुख्य कारण अगरबत्ती जलाने पर श्वसन के द्वारा अंदर जाने वाला धुंआ है (जिसमें वाष्पशील कार्बनिक यौगिक और कणिका तत्व होते हैं)। इससे रक्त वाहिकाओं की सूजन बढ़ जाती है तथा रक्त प्रवाह प्रभावित होता है जिसके कारण हृदय से संबंधित समस्याएं बढ़ जाती हैं।

क्या इसका कोई वैज्ञानिक कारण है?:अगरबत्ती के जलने से उतपन्न हुई सुगन्ध के प्रसार के लिए फेथलेट नाम के विशिष्ट केमिकल का प्रयोग किया जाता है यह एक फेथलिक एसिड का ईस्टर होता है यह भी स्वांस के साथ शरीर मे प्रवेश करता है इस प्रकार अगरबत्ती की तथाकथित सुगन्ध न्यूरोटॉक्सिक एवम हेप्टोटोक्सिक को भी स्वांस के साथ शरीर मे पहुचाती है इसकी लेश मात्र उपस्थिति केन्सर अथवा मस्तिष्क आघात का कारण बन सकती है हेप्टो टॉक्सिक की थोड़ी सी मात्रा लीवर को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।

हमारे शास्त्रो  में ?: शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नही मिलता सब जगह धूप ही लिखा है। अगरबत्ती का प्रयोग भारतवर्ष में इस्लाम के आगमन के साथ ही शुरू हुआ था। शास्त्रो में हर स्थान पर धूप, दीप, नैवेद्य का ही वर्णन है। हमारे धर्म की हर एक बातें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार हैं जो मानवमात्र के कल्याण के लिए ही बनी है। आज हमें हमारे स्वास्थ क संरक्षण करने वाली धूप, यज्ञ, हवन सामग्री पर विशिष्टा ध्यान देने की आवष्यकता है। अतः सामथ्र्य अनुसार स्वच्छ धूप का ही प्रयोग करें।